लोकसभा ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी। नए ‘उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026’ के लागू होने से शीर्ष अदालत में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित जजों की कुल संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।

सदन में विपक्षी सांसदों के भारी शोर-शराबे और हंगामे के बीच केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस विधेयक को पेश किया। संसद ने बिना किसी विस्तृत चर्चा के इसे ध्वनि मत (Voice Vote) से पारित कर दिया। यह नया कानून मई 2026 में केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए अध्यादेश का स्थान लेगा।

92 हजार से अधिक लंबित मामले और बढ़ता दबाव

संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पर मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के मुताबिक, शीर्ष अदालत में लंबित मुकदमों की संख्या 92,000 का आंकड़ा पार कर चुकी है।

अकेले वर्ष 2025 में ही सुप्रीम कोर्ट में 75,410 नए मामले दर्ज हुए थे, जबकि अदालत केवल 65,615 मुकदमों का ही निपटारा कर सकी थी। नए न्यायाधीशों की नियुक्ति होने से मुकदमों की सुनवाई में तेजी आएगी। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश को महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों के लिए नियमित रूप से 5 या अधिक जजों की संविधान पीठ (Constitution Benches) गठित करने में आसानी होगी।

हंगामे के बीच अध्यादेश के खिलाफ प्रस्ताव खारिज

लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने नीट-यूजी और अन्य मुद्दों पर नारेबाजी शुरू कर दी। हंगामे के बीच ही विपक्ष द्वारा मई में जारी अध्यादेश के खिलाफ लाए गए सांविधिक संकल्प (Statutory Resolution) को सदन ने ध्वनि मत से खारिज कर दिया। इसके तुरंत बाद कानून मंत्री ने विधेयक को पारित कराने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी।

1950 से अब तक कैसे बढ़ी जजों की संख्या?

जब 1950 में देश का संविधान लागू हुआ था, तब सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश समेत केवल 8 जज होते थे। इसके बाद मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए संसद ने समय-समय पर कानूनों में संशोधन करके जजों की संख्या बढ़ाई:

  • 1950: 8 जज
  • 1956: 11 जज
  • 1960: 14 जज
  • 1978: 18 जज
  • 1986: 26 जज
  • 2009: 31 जज
  • 2019: 34 जज
  • 2026: 38 जज (वर्तमान संशोधन)

वित्तीय बजट और आगे की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट में 4 नए न्यायाधीशों और उनके सहायक कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए सरकार ने वित्तीय प्रावधान भी किए हैं। इन नए पदों के कारण हर साल लगभग ₹10.56 करोड़ का आवर्ती (Recurring) खर्च आएगा, जबकि शुरुआती बुनियादी ढांचे पर ₹3.47 करोड़ का एकमुश्त खर्च होगा।

लोकसभा से पारित होने के बाद इस बिल को अब राज्यसभा में पेश किया जाएगा। संसद के दोनों सदनों से हरी झंडी मिलने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कॉलेजियम प्रणाली के जरिए नए जजों के नामों की सिफारिश की जाएगी।