बिहार चुनाव को अभी एक साल भी नहीं हुआ है, लेकिन बिहार एक बार फिर से चुनावी राजनीति को लेकर सुर्खियों में हैं। इसकी वजह बांकीपुर का उपचुनाव है, जहां रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर चुनावी अखाड़े में अपना पहला दांव खेलने की तैयारी में हैं।
बीते विधानसभा चुनाव में प्रशांत की पार्टी जनसुराज का वोट शेयर चार प्रतिशत भी नहीं था. लेकिन तब प्रशांत किशोर खुद चुनावी मैदान में नहीं थे.
अब करीब नौ महीने बाद प्रशांत किशोर ने उपचुनाव लड़ने का फैसला किया है.
क्या हैं पार्टी के तर्क?
उनका ये फैसला चौंकाने वाला कहा जा सकता है और इसके पीछे कई तर्क भी दिए जा रहे हैं।
बीते विधानसभा चुनाव में बांकीपुर विधानसभा सीट से जन सुराज पार्टी की उम्मीदवार वंदना कुमारी को आठ हज़ार से भी कम वोट मिले थे.
वहीं बीजेपी के नितिन नबीन को 98 हज़ार से ज़्यादा वोट पाकर विजयी घोषित हुए थे. बीजेपी यहाँ से 1995 से चुनाव हारी नहीं है. अब इस सीट पर नितिन नबीन के इस्तीफ़े के बाद उपचुनाव हो रहा है.
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि पिछले नौ महीने में ऐसा क्या बदल गया कि प्रशांत किशोर को बीजेपी के गढ़ में चुनाव लड़ने के लिए कमर कस ली है?
जनसुराज इस फैसले के पीछे यह तर्क दे रही है कि बीजेपी के वोटर जनसुराज पार्टी को वोट नहीं दे पाए क्योंकि उन्हें आरजेडी के जीतने का डर था. इसलिए पिछले चुनाव में जनसुराज को बहुत कम वोट मिले।
प्रशांत किशोर की रणनीति क्या है?
जनसुराज की नेता वंदना कुमारी का कहना है कि बीजेपी को चुनाव में जीत नीतीश कुमार के चेहरे पर मिली थी लेकिन अब सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं और यह जनसुराज के पक्ष में जाएगा.
एक तर्क यह भी है कि बिहार में सम्राट चौधरी को लेकर कई सवाल हैं. सम्राट चौधरी को लेकर बीजेपी का पढ़ा लिखा वोटर बहुत ख़ुश नहीं है. बांकीपुर पूरी तरह से अर्बन सीट है और यहां कथित ऊंची जातियों की आबादी बहुत ज़्यादा है.
राम मंदिर में चोरी से भी बीजेपी घेरे में है. ऐसे में प्रशांत किशोर इसे मौक़े के रूप में देख रहे हैं.
तो क्या यह जीत प्रशांत किशोर और जनसुराज के लिए ऑक्सीजन का काम करेगी?
जानकार कहते हैं कि प्रशांत किशोर एक संदेश देना चाहते हैं कि वह बिहार में मज़बूती से खड़े हैं. इस संदेश को देने के लिए ज़रूरी नहीं है कि चुनाव जीता ही जाए.
प्रशांत के पास खोने के लिए बहुत कुछ है नहीं और वह राजनीतिक परिदृश्य से गायब होना नहीं चाहते। अगर वह चुनाव जीतते हैं तो बिहार और देश की राजनीति में मजबूती से उभरेंगे, हारे तो भी उन्हें कोई बड़ा नुकसान होने से रहा, क्योंकि अभी तक जनसुराज ने पार्टी के तौर पर कुछ बड़ा हासिल नहीं किया है।
अगर प्रशांत चुनाव जीत जाते हैं तो वह स्वयं को बिहार में विपक्ष के तौर पर पेश करने की कोशिश करेंगे जिसका लाभ उन्हें आगामी चुनावों में मिल सकता है।
एक पक्ष ये भी रखा जा रहा है कि अगर प्रशांत दूसरा स्थान भी हासिल कर लेते हैं तो वह कह सकते हैं कि उन्होंने आरजेडी को हरा दिया है। इसका इस्तेमाल करके वह खुद को विपक्ष के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या कहते हैं बांकीपुर के जातीय समीकरण?
यहां से चुनाव लड़ने के पीछे एक वजह उनकी जातीय पहचान भी कही जा रही है। यह सीट मूल रूप से जातीय अगड़ों के बहुमत वाली सीट है और प्रशांत वहीं से आते हैं।
लेकिन कुछ जानकार इस जातीय पहचान को प्रशांत के लिए घातक बता रहे हैं, खासकर बांकीपुर विधानसभा के संदर्भ में। कहा जाता है कि बिहार में जाति की पहचान अब भी बहुत बड़ी है और सवर्णों का मोह बीजेपी से अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
इस बीच बीजेपी ने मंगलवार को अपने युवा नेता और कायस्थ समुदाय से आने वाले युवा कार्यकर्ता अभिषेक कुमार को इस सीट से उम्मीदवार घोषित किया.
विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल ने अपनी उम्मीदवार रेखा कुमारी उर्फ़ रेखा गुप्ता को बरकरार रखा है, जिन्हें 2025 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर नितिन नवीन के खिलाफ करीब 47,000 वोट मिले थे.
लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की नई पार्टी जनशक्ति जनता दल ने इस सीट से सामाजिक कार्यकर्ता वीणा मानवी को अपना उम्मीदवार घोषित किया है.
पहले इस विधानसभा क्षेत्र को पटना पश्चिम सीट के नाम से जाना जाता था. अपने पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के असामयिक निधन के बाद नितिन नबीन ने राजनीति में कदम रखा और 2006 में पहली बार इस सीट से विधानसभा चुनाव जीता.
तब से यह इस सीट लगातार उनके पास है. पटना जिले की बांकीपुर विधानसभा सीट पर करीब चार लाख मतदाता हैं और यहां कायस्थ और वैश्य यानी व्यापारी वर्ग के मतदाताओं का प्रभाव माना जाता है.
इस क्षेत्र में कायस्थ समुदाय कुल मतदाताओं का करीब 15-20% है, जबकि वैश्य समुदाय भी पटना ज़िले की इस शहरी सीट पर एक बड़ा सामाजिक समूह है.
ऐसे समीकरणों के बीच बिहार सहित पूरे देश के राजनीतिक और बौद्धिक खेमों की नजर बांकीपुर पर टिकी हुई है।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.



