यूपीआई ने भारत के पैसे भेजने-लेने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. चांदनी चौक की गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक इसका असर दिखता है. आज 55 करोड़ लोग और 6.5 करोड़ कारोबारी इससे जुड़े हैं. मुफ्त सुविधा ही इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है. अब सवाल उठ रहा है कि क्या बड़े लेन-देन पर शुल्क लगे. हालांकि सरकार साफ कह चुकी है कि आम ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा.
भारत की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान व्यवस्था यूपीआई की कामयाबी की कहानी भारत की गलियों से शुरू होती है. यह कहानी सड़क किनारे सामान बेचने वालों से लेकर बड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों तक फैली है. यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस ने भारत में पैसे देने और लेने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है.
यूपीआई की यह कामयाबी भारत के उन डिजिटल बदलावों में शामिल है जिसने करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के लेन-देन का तरीका बदल डाला.
आंकड़े क्या कहते हैं
आज यूपीआई से देश के 55 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े हैं. साथ ही 6.5 करोड़ कारोबारी भी इसका इस्तेमाल करते हैं. इसे शुरू से ही एक सार्वजनिक डिजिटल सुविधा के तौर पर तैयार किया गया था. मकसद सिर्फ पैसे भेजना-लेना नहीं था. मकसद था ज्यादा से ज्यादा लोगों को औपचारिक डिजिटल वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना. यही वजह है कि यूपीआई ने वित्तीय पहुंच बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
दुनिया में हर दो रियल-टाइम डिजिटल भुगतानों में से एक भारत में होता है. यूपीआई के जरिए हर सेकंड करीब 1 करोड़ रुपये का लेन-देन होता है. वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई से 314 लाख करोड़ रुपये का भुगतान हुआ.
अब यूपीआई सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा. यह दुनिया के 11 देशों में काम कर रहा है. इनमें फ्रांस, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं. भारत की क्यूआर कोड आधारित भुगतान प्रणाली अब दुनिया की डिजिटल भुगतान व्यवस्था में एक बड़ी कामयाबी बन चुकी है. कई देश इसे अपना भी रहे हैं.
आखिर यूपीआई इतना सफल कैसे हुआ?
इसकी सबसे बड़ी वजह है इसकी आसान और मुफ्त व्यवस्था. आम लोगों और छोटे कारोबारियों को बिना किसी शुल्क के तत्काल भुगतान की सुविधा मिली, इसलिए करोड़ों लोगों ने इसे अपनाया. व्यापारी छूट शुल्क न होने से लाखों छोटे कारोबारियों के लिए डिजिटल भुगतान अपनाना आसान हो गया.
चाहे सड़क किनारे सामान बेचने वाला दुकानदार हो या बड़े बाजार का कारोबारी, ग्राहक के फोन से कुछ सेकंड में उसके खाते में पैसे पहुंच जाते हैं. न नकदी गिनने की झंझट, न छुट्टे पैसों की चिंता, न पैसे लेकर चलने का खतरा.
इस कामयाबी के पीछे सिर्फ एक तकनीक नहीं है. इसके पीछे कई सालों में तैयार हुआ पूरा डिजिटल ढांचा है. स्मार्टफोन का बढ़ता इस्तेमाल, आधार, जनधन खाते और सीधे लाभ हस्तांतरण ने देश में डिजिटल वित्तीय व्यवस्था की नींव मजबूत की. नोटबंदी ने डिजिटल भुगतान की जरूरत तेज कर दी. फिर कोविड महामारी के दौरान संपर्क रहित भुगतान की जरूरत ने यूपीआई को और ज्यादा लोगों तक पहुंचा दिया.
इस तरह तकनीक, सरकारी नीतियां और आम आदमी की बदलती जरूरतें, तीनों ने मिलकर यूपीआई के विस्तार का रास्ता तैयार किया और इसकी रफ्तार भी बढ़ाई.
आज इसकी पहुंच हर तरह के बाजारों में साफ दिखती है. यहां रेहड़ी वाले, दुकानदार, थोक कारोबारी और ग्राहक रोज यूपीआई से भुगतान करते हैं. छोटे शहरों और गांवों में भी अब क्यूआर कोड आम बात हो गया है.
यही यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत है. यह सिर्फ बड़े शहरों या बड़े कारोबारियों की भुगतान व्यवस्था नहीं है. इसने छोटे कारोबारियों और आम लोगों को भी डिजिटल भुगतान की दुनिया में बराबरी की जगह दी है.
यूपीआई शुल्क पर सरकार का रुख
यूपीआई शुल्क को लेकर सरकार का रुख भी साफ है. मानसून सत्र के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि ग्राहकों से यूपीआई शुल्क नहीं लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि यूपीआई शुरुआत से ही ग्राहकों के लिए मुफ्त रहा है, और हर भारतीय बिना किसी लेन-देन शुल्क के इस तत्काल डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल करता रहेगा.
इस पूरी बहस का एक और संवेदनशील पहलू अमेरिका से जुड़े दबाव के आरोप हैं. भारत के अपने डिजिटल भुगतान नेटवर्क की तेज रफ्तार से वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय भुगतान कंपनियों के लिए भारतीय बाजार का परिदृश्य बदल गया है. यूपीआई ने पारंपरिक कार्ड आधारित भुगतान व्यवस्था पर निर्भरता कम कर दी है.
यही आज यूपीआई की पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू भी है. यह अब सिर्फ पैसों के लेन-देन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि देश की सबसे बड़ी डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्थाओं में से एक बन चुका है. इसने करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान से जोड़ा है, छोटे कारोबारियों को नई सुविधा दी है और भारत को दुनिया के डिजिटल भुगतान नक्शे पर सबसे आगे खड़ा किया है.
यूपीआई का मुफ्त मॉडल बने रहना चाहिए
इसकी शुरुआत एक आसान विचार से हुई थी. इसे एक ऐसे डिजिटल भुगतान तंत्र के रूप में तैयार किया गया था जिसे आम लोग आसानी से इस्तेमाल कर सकें और जिसके लिए उन्हें कोई शुल्क न देना पड़े. दस साल बाद यही सोच भारत की सबसे बड़ी डिजिटल वित्तीय कामयाबियों में बदल चुकी है.
यूपीआई की अगली कहानी सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि इससे कितने और लोग जुड़ते हैं. यह इस बात पर भी निर्भर करेगी कि भारत अपनी इस डिजिटल व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत को कितना सुरक्षित रख पाता है.
यह इसलिए सफल हुआ क्योंकि यह न सिर्फ आसान और तेज था, बल्कि आम लोगों से लेकर छोटे कारोबारियों तक के लिए यह मुफ्त में उपलब्ध था. अगर अगले 10 साल में इसे और आगे बढ़ना है, तो इसका मुफ्त मॉडल ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बना रहना चाहिए.

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




