बुधवार से भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता लागू हो गया, जिससे 99% भारतीय निर्यात पर टैक्स खत्म हो गया है। टेक्सटाइल, गारमेंट और स्कॉच व्हिस्की जैसे क्षेत्रों को सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। स्कॉच पर टैरिफ 150% से घटकर 75% हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि असली असर अगले एक से तीन साल में दिखेगा, हालांकि छोटे कारोबारियों की कम जागरूकता एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
बुधवार से लागू हुए भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का फायदा उठाने के लिए भारतीय कंपनियां तेजी से तैयारी में जुट गई हैं। इनमें वेल्सपन लिविंग जैसी कंपनियां भी शामिल हैं, जो विंबलडन के लिए तौलिए बनाती हैं।
वेल्सपन लिविंग भारत की सबसे बड़ी होम टेक्सटाइल कंपनियों में से एक है। यह जॉन लुईस और टेस्को जैसे बड़े ब्रिटिश रिटेलरों को चादरें और तौलिए सप्लाई करती है। कंपनी की सीईओ दीपाली गोयनका ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में कई ब्रिटिश ब्रांड भारत आए।
वे अगले कुछ वर्षों की कारोबारी योजना बनाने के लिए यहां पहुंचे। पहले ऐसी संयुक्त योजना सिर्फ अमेरिकी ग्राहकों के साथ होती थी। अब यह ब्रिटिश ग्राहकों के साथ भी होने लगी है। गोयनका ने यह भी बताया कि उनकी लंदन टीम इस समय जॉन लुईस के दफ्तर में ही बैठी काम कर रही है।
कौन से उत्पादों को सीधा फायदा
यह समझौता दुनिया की पांचवीं और छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हुआ है। इसके तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले 99% निर्यात पर टैरिफ हटा दिया गया है या घटा दिया गया है।
वहीं ब्रिटेन से भारत आने वाले 90% आयात पर भी टैरिफ में राहत मिली है। ब्रिटेन सरकार ने इसे यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद का सबसे बड़ा और सबसे अहम द्विपक्षीय व्यापार समझौता बताया है। अनुमान है कि इससे ब्रिटेन की जीडीपी में 0.13% और भारत की जीडीपी में 0.06% की सालाना बढ़ोतरी हो सकती है।
टेक्सटाइल, गारमेंट, फुटवियर, कार और समुद्री उत्पाद जैसे मजदूर-प्रधान क्षेत्रों को इस समझौते से खासा फायदा होने की उम्मीद है। गोयनका ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ब्रिटेन को होने वाला निर्यात अब दहाई अंकों की दर से बढ़ेगा।
उन्होंने बताया कि अब तक भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के मुकाबले नुकसान में था। इन देशों का निर्यात डेवलपिंग कंट्रीज ट्रेडिंग स्कीम के तहत बिना टैक्स के ब्रिटेन जाता था, जबकि भारत को 12% टैरिफ देना पड़ता था।
अब यह स्थिति बदलने वाली है। गोयनका के मुताबिक होम टेक्सटाइल क्षेत्र में पाकिस्तान की हिस्सेदारी ब्रिटेन के कुल आयात में करीब 55% है, जबकि भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 6-7% है। अब भारत इस अंतर को पाटने की कोशिश करेगा।

यह समझौता ब्रिटिश शराब कंपनियों के लिए भी बड़ा मौका लेकर आया है। स्कॉच व्हिस्की पर सीमा शुल्क तुरंत 150% से घटाकर 75% कर दिया गया है। अगले 10 सालों में इसे धीरे-धीरे घटाकर 40% तक लाया जाएगा।
दिल्ली की आयात कंपनी मॉडर्न ड्रिंक्स प्राइवेट लिमिटेड के अवनीत सिंह इसे बड़ा और असली बदलाव मानते हैं। उनका कहना है कि आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि इससे आयात में कितनी बढ़ोतरी होती है।
फिलहाल कंपनियां अपने ऑपरेशन को दुरुस्त करने में जुटी हैं। इसमें ब्रिटिश सप्लायरों के साथ मिलकर सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन और अन्य कागजी कार्रवाई पूरी करना शामिल है।
साथ ही कस्टम नियमों की समीक्षा और लॉजिस्टिक्स पार्टनरों के साथ तालमेल बिठाया जा रहा है, ताकि नई टैरिफ व्यवस्था का फायदा पहले दिन से मिल सके।
क्या कहते हैं आंकड़े
हालांकि व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का कुल असर उतना बड़ा नहीं, जितना कुछ खास क्षेत्रों में दिख सकता है। दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने ब्रिटेन को 13.4 अरब डॉलर का माल निर्यात किया।
इसमें से आधे से ज्यादा निर्यात पहले से ही सबसे तरजीही राष्ट्र (MFN) व्यवस्था के तहत बिना टैक्स के हो रहा था। दूसरी ओर भारत ने ब्रिटेन से 11.7 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें 45% से ज्यादा हिस्सा चांदी का था। चांदी इस समझौते के दायरे से बाहर है।

GTRI के अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि असली परीक्षा यह देखना होगा कि टेक्सटाइल, गारमेंट, फुटवियर, कारपेट, कार, समुद्री भोजन, अंगूर और आम जैसे उत्पादों पर, जिन पर पहले 4 से 16% तक टैरिफ लगता था, अब कितने ज्यादा ऑर्डर मिलते हैं। उनका कहना है कि इस समझौते का असली नतीजा अगले एक से तीन साल में सामने आएगा।
श्रीवास्तव के मुताबिक कुछ अड़चनें अब भी बनी हुई हैं। ब्रिटेन एक तय सीमा से ज्यादा स्टील आयात पर टैरिफ बनाए रखे हुए है, ताकि अपने घरेलू उत्पादकों को बचाया जा सके।
इसके अलावा ब्रिटेन का प्रस्तावित कार्बन टैक्स (CBAM) भी समझौते के फायदे को कम कर सकता है। भले ही टैरिफ शून्य हो जाए, लेकिन कार्बन से जुड़े बॉर्डर चार्ज भारतीय निर्यात की लागत बढ़ा सकते हैं।
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से कितना फायदा
भारत में मुक्त व्यापार समझौतों का इस्तेमाल हमेशा से कम रहा है, क्योंकि छोटे कारोबारियों को अक्सर नए नियमों की जानकारी ही नहीं होती। इसी वजह से भारत के महज 20-30% योग्य निर्यात ही इन समझौतों का फायदा उठा पाते हैं, जबकि आयात के मामले में यह दर काफी ज्यादा है।
जैसे किसी भारतीय गारमेंट निर्यातक को खुद अपने ब्रिटिश खरीदार को बताना होगा कि शर्ट पर आयात शुल्क 12% से घटकर शून्य हो गया है, और उसी हिसाब से दाम और अनुबंध तय करने होंगे। श्रीवास्तव कहते हैं कि सरकार और उद्योग संगठनों को इस दिशा में सक्रिय रहना होगा, वरना टैरिफ घटने का फायदा अपने आप निर्यात बढ़ाने में तब्दील नहीं होगा।
फिर भी भारत के लिए यह सही समय पर आया मौका माना जा रहा है, खासकर रेडीमेड गारमेंट क्षेत्र में। CareEdge रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के रेडीमेड गारमेंट आयात में सबसे बड़ा हिस्सा अब भी चीन का है, लेकिन बढ़ती लागत और घटती प्रतिस्पर्धात्मकता के चलते चीन की हिस्सेदारी लगातार घट रही है।
साथ ही कई ब्रांड बांग्लादेश जैसे देशों से भी दूरी बना रहे हैं, जो हाल तक सामाजिक-राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। ऐसे में उम्मीद है कि भारत की हिस्सेदारी 2024 के 6% से बढ़कर आने वाले सालों में 12% तक पहुंच सकती है।
CareEdge के मुताबिक दोनों देशों के बीच कुल व्यापार में अब हर साल 15% की बढ़ोतरी हो सकती है, जो अभी की 10-12% की दर से कहीं ज्यादा है। इससे दोनों तरफ के उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा विकल्प मिलने की उम्मीद है।

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