मध्य प्रदेश का दतिया जिला शुक्रवार शाम से हिंसात्मक प्रदर्शनों के चलते चर्चा में रहा। यह प्रदर्शन बीजेपी के कार्यकर्ता अपनी ही पार्टी संगठन के खिलाफ कर रहे थे। वजह थी दतिया से तीन बार के विधायक और राज्य सरकार में गृह मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा को उपचुनाव के लिए पार्टी टिकट न मिलना।
नरोत्तम मिश्रा के समर्थक उनकी जगह आशुतोष तिवारी को टिकट दिए जाने से नाराज थे। पहले सड़क जाम करके विरोध प्रदर्शन शुरू किया गया। धीरे-धीरे ये प्रदर्शन हिंसक होता चला गया। इसे नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को भारी संख्या में पुलिस बल का प्रयोग करना पड़ा।
इस दौरान कई उच्च पुलिस अधिकारियों को चोटें आई और कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी सूचना प्राप्त हुई। प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए पूरे जिले में बीएनएस की धारा 163 लागू कर दी गई।
ये चर्चा भले ही विरोध प्रदर्शन से शुरू हुई हो, लेकिन इस घटनाक्रम के साथ ही कई सवाल भी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य सरकार के पूर्व गृह मंत्री और कभी मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा माने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा आखिर विधानसभा का टिकट हासिल करने से कैसे चूक गए। क्या इसकी एकमात्र वजह पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी हार है या कुछ और भी कारण हैं।
दतिया का ये उपचुनाव नरोत्तम मिश्रा के लिए एक संजीवनी की तरह माना जा रहा था और ये भी कहा जा सकता है कि ये उनकी राजनीतिक वापसी का मंच बन सकता था। फिर रातों रात ऐसा क्या हुआ कि इस कद्दावर नेता की वापसी के रास्ते पार्टी संगठन ने खुद ही बंद कर दिए।
अगर बीजेपी संगठन और आरएसएस की कार्यशैली पर गौर किया जाए तो ये फैसला बहुत चौंकाने वाला नहीं लगता। इससे पहले भी कई अवसरों पर ऐसे फैसले लिए जाते रहे हैं। पार्टी और इसका पैतृक संगठन हमेशा ही नेता के कद की जगह विचार और भविष्य के लक्ष्यों के अनुरूप काम करता हैं। लेकिन इस फैसले के पीछे कुछ और भी वजहें बताई जा रही हैं।
राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा आम है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और नरोत्तम मिश्रा के बीच का गुणा गणित कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसके चलते मोहन यादव जो कि राज्य की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में अग्रसर हैं एक और ताकतवर चेहरा अपने सामने खड़ा करना नहीं चाहते।
इस बात को शीर्ष नेतृत्व भी अच्छी तरह से समझ रहा है। फिलहाल पार्टी की नजर में मोहन यादव पावर ऑफ सेंटर के लिए अभी सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। और पार्टी नहीं चाहती कि नरोत्तम मिश्रा जीत कर आएं और राज्य की राजनीति में पार्टी के भीतर ही दो अलग-अलग शक्ति के केंद्र स्थापित हो जाएं।
बीते कुछ दिनों में मुख्यमंत्री मोहन यादव पर कुर्सी के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। इसके अलावा लगातार कई महीनों से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में पार्टी नहीं चाहती थी कि सरकार के साथ-साथ संगठन के भीतर भी नए पावर सेंटर्स बन जाएं और आपसी खींचतान को बढ़ावा मिले।
इससे भविष्य की राजनीति में पार्टी संगठन कमजोर होगा जिसका खामियाजा चुनाव परिणाम में भुगतना पड़ सकता है।
कौन हैं आशुतोष तिवारी

पार्टी ने दतिया से आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है, जिनकी पहचान एक संगठनात्मक नेता की रही है। वो एबीवीपी से लेकर बीजेपी संगठन तक अलग-अलग पदों की जिम्मेदारियां निभा चुके हैं, उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा चुनावी राजनीति से ज्यादा संगठन के भीतर रही है।
उम्मीदवार का चयन भी अपने आप में एक संदेश है। यहां पार्टी स्पष्ट रूप से यह संदेश देना चाहती है कि संगठन में व्यक्तिगत कद से ज़्यादा संगठनात्मक निष्ठा को प्राथमिकता दी जाती है। यही वजह है कि जिस सीट से छह बार विधायक रहे नेता टिकट की दौड़ में थे, वहां पहली बार चुनाव लड़ने वाले नेता को आगे किया गया है।
क्या है दतिया का चुनावी गणित
कहा जाता है कि दतिया का चुनावी गणित केवल उम्मीदवारों के चेहरों से तय नहीं होता है, यहां सामाजिक और जातीय समीकरण भी ज्यादा मायने रखते हैं।
मौजूदा अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक इस सीट पर करीब 35 हजार के आसपास ब्राह्मण मतदाता हैं, जो कि पारंपरिक रूप से बीजेपी के आधार वोटर्स हैं। यहां अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 60 हजार के करीब बताई जाती है, जो कि जीत-हार तय करने में मजबूत फैक्टर साबित होते हैं।
इसके साथ ही 30 हजार के करीब कुशवाहा और 15-16 हजार यादव वोटर्स की संख्या भी चुनाव की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस बार आजाद समाज पार्टी ने दामोदर यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है।
कहा जा रहा है कि दामोदर अपने सजातीय वोटर्स के साथ ही अनुसूचित जाति के वोट भी अपनी ओर खींच सकते हैं। इससे कांग्रेस की राहें और मुश्किल होती नजर आ रही हैं, क्योंकि मध्य प्रदेश में ये जातियां कांग्रेस की पारंपरिक वोट बैंक रही हैं।
इससे पहले बीजेपी ने कुशवाहा समाज की नाराजगी को दूर करने के लिए रघुवीर कुशवाहा को जिला अध्यक्ष बनाया है। इस तरह से बीजेपी ने जातीय समीकरण भी अपने पक्ष में करने के भरसक प्रयास किए हैं। ऐसे में पार्टी नए चेहरे पर दांव लगाने के अनुकूल स्थितियां देख रही है।
शीर्ष नेतृत्व को इस बात का आभास है कि हालात उसके नियंत्रण में हैं, इसी बहाने संगठन में अनुशासनात्मक कार्यवाही को अंजाम दिया जा रहा है। नरोत्तम मिश्रा की राजनीति का तरीका और रौब से सभी परिचित हैं।
शीर्ष नेतृत्व अब मध्य प्रदेश ही नहीं पूरे देश में यह संदेश देना चाहता है कि बीजेपी राजनीतिक सुचिता की पार्टी है और यहां व्यक्तिगत कद से ज्यादा अनुशासन को महत्व दिया जाता है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो इस फैसले का असर सिर्फ तात्कालिक नहीं है, यह भविष्य की ओर संकेत है। पार्टी के भीतर अब किसी नेता के राजनीतिक कद या चुनाव जिताने की क्षमता से सत्ता, संगठन और नेतृत्व का संतुलन ज्यादा जरूरी है।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




