सऊदी अरब इस समय एक मुश्किल दुविधा का सामना कर रहा है। इस साल की शुरुआत में जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ी थी। तब से सऊदी अरब ने खुद को इससे ज्यादातर दूर रखने की कोशिश की है।

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। तीन तरफ से हमलों का सामना करने के बाद सऊदी अरब का सब्र जवाब दे चुका है। इसी हफ्ते उसने अमेरिका के साथ मिलकर इराक में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों पर संयुक्त हमले किए।

सऊदी अरब का मानना है कि ये समूह ड्रोन हमलों के जरिए उसे निशाना बना रहे थे। अब सऊदी अरब के सामने एक बड़ा सवाल है। क्या वह जवाबी हमले जारी रखे ताकि विरोधी डर जाएं? या फिर तनाव कम करने की कोशिश करे?

तनाव घटाने के लिए एक और रास्ता भी है। सऊदी अरब अपने कुछ विरोधियों के साथ समझौता कर सकता है, या उन्हें किसी तरह संतुष्ट कर सकता है। तो आखिर किस पर कौन हमला कर रहा है, और इसकी वजह क्या है?

‘पॉप्युलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज’ क्या है

पहले थोड़ा संदर्भ समझ लेते हैं। पिछले पांच महीनों से खाड़ी क्षेत्र और मध्य पूर्व के दूसरे हिस्सों में यह संघर्ष चल रहा है। इसमें मोटे तौर पर दो पक्ष हैं।

एक तरफ ईरान है, साथ में उसकी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर, यानी आईआरजीसी। उनके साथ यमन के हूती भी हैं। हूती एक कबायली समूह है, जिसने 2014 में यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था।

इराक में ‘पॉप्युलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज’ नाम का एक अर्धसैनिक समूह भी है। इसे ईरान का समर्थन हासिल है। आरोप है कि इस समूह ने सऊदी अरब पर 30 ड्रोन हमले किए। अब उसी पर जवाबी हमला किया गया है।

ईरान के पक्ष में लेबनान में हिज्बुल्लाह भी है। यह संगठन अब भी काफी ताकतवर माना जाता है, लेकिन फिलहाल उसने खुद को शांत रखा हुआ है।

दूसरा पक्ष

इस संघर्ष के दूसरे पक्ष में अमेरिका है। उसकी सेंट्रल कमान, यानी सेंटकॉम की सेनाएं बेहद शक्तिशाली मानी जाती हैं। साथ ही खाड़ी के अरब देश और जॉर्डन भी अलग-अलग स्तर पर इसमें शामिल हैं।

इसराइल इस जंग में अमेरिका का करीबी सहयोगी बना हुआ है, लेकिन फिलहाल वह सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं ले रहा। हाल ही में ईरान ने अपने ड्रोन और मिसाइल हमलों का रुख जॉर्डन, कुवैत और बहरीन की ओर मोड़ा है। साथ ही उसने उन सभी कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया है, जो ईरान के नए नियमों और मार्गों से बचते हुए होर्मुज स्ट्रेट से निकलने की कोशिश करते हैं।

यमन में इराकी मिलिशिया और हूती विद्रोहियों का शामिल होना एक नई घटना है। यह दिखाता है कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते के बिना यह पूरा इलाका एक बड़े संघर्ष में और उलझ सकता है।

विजन 2030 का दबाव

कई वजहों से सऊदी अरब पूर्ण पैमाने के संघर्ष में नहीं फंसना चाहता। देश के असल शासक माने जाने वाले युवा क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब को ‘विजन 2030’ नाम की एक नई विकास योजना पर आगे बढ़ाया है।

इस योजना का मकसद अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना और देश के भविष्य को बेहतर करना है। उनका इरादा है कि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल की आमदनी पर निर्भर न रहे।

वे ऐसे आधुनिक और मजबूत घरेलू उद्योग खड़ा करना चाहते हैं, जो हर साल नौकरी के बाजार में आने वाले लाखों विद्यार्थियों, स्नातकों और स्कूल छोड़ने वाले युवाओं को अच्छे रोजगार दे सकें।

‘विजन 2030’ का एक बड़ा हिस्सा विदेशी निवेश को आकर्षित करना भी है। इसके तहत डेटा सेंटर जैसी कई नई सुविधाएं और ढांचे बनाए जा रहे हैं, जिन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता है।

तेल सऊदी की सबसे बड़ी ताकत

अगर सऊदी अरब को यमन में हूती विद्रोहियों से लगातार ड्रोन हमलों का खतरा बना रहे, या ईरान सीधे बैलिस्टिक मिसाइलें दागता रहे, तो यह पूरी योजना कामयाब नहीं हो पाएगी।

सितंबर 2019 में सऊदी अरब को एक बड़ा झटका लगा था। उस समय ईरान के साथ उसके रिश्ते काफी खराब थे। एक सुबह सऊदी अरब को पता चला कि इराक में मौजूद एक ईरान समर्थित मिलिशिया ने उसके दो सबसे अहम तेल केंद्रों पर ड्रोन हमला किया है। ये केंद्र अबकैक और खुरैस में स्थित हैं।

उस समय यह भी कहा गया था कि हमला यमन के हूती विद्रोहियों ने किया। लेकिन हमले के तुरंत बाद वहां पहुंचने पर ढांचों पर बने छेद साफ दिखाई दिए। सभी छेद उत्तर दिशा की ओर थे। इससे संकेत मिलता था कि हमला यमन से नहीं, बल्कि उत्तर की दिशा से हुआ था।

उस हमले की वजह से सऊदी अरब के तेल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा कई दिनों तक ठप हो गया था। इस घटना ने रियाद को एहसास कराया कि देश का अहम बुनियादी ढांचा हमलों के प्रति कितना संवेदनशील है।

सोमवार को जारी सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा कि अबकैक तेल केंद्र पर फिर ड्रोन हमला हुआ है। कहा जा रहा है कि ये ड्रोन भी इराक में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया ने भेजे थे। तेल आज भी सऊदी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है।

होर्मुज से बाब अल-मंदेब तक की जंग

फरवरी में अमेरिका और इसराइल के हमलों के जवाब में ईरान ने कदम उठाया। उसने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को प्रभावी रूप से रोक दिया। यह ईरान और खाड़ी क्षेत्र के बीच स्थित एक बेहद अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से गुजरती है।

इसके जवाब में सऊदी अरब ने जितना संभव था, उतना तेल पंप किया। उसने रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल पूर्व से पश्चिम जाने वाली पाइपलाइन के जरिए भेजा। यह तेल लाल सागर तट पर स्थित यनबू के निर्यात टर्मिनल तक पहुंचाया गया। वहां से तेल टैंकरों में भरा गया, और ये टैंकर दक्षिण की ओर अरब सागर के रास्ते एशियाई बाजारों के लिए रवाना हुए।

शुरुआत में यह व्यवस्था ठीक चलती रही। लेकिन 13 जुलाई को सऊदी अरब ने यमन की राजधानी सना के बाहरी इलाके में स्थित हवाई अड्डे पर बमबारी की। इस हमले की जिम्मेदारी यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने ली। उसका कहना था कि वह एक ईरानी विमान को उतरने से रोकना चाहती थी।

इसके जवाब में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के आभा और जिजान हवाई अड्डों पर हमले किए। रियाद के लिए चिंता की बात यह है कि हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी जहाजों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है।

इस वजह से लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से गुजरना बेहद खतरनाक हो गया है। यह समुद्री रास्ता बेहद संकरा और अहम माना जाता है। इसका सीधा असर सऊदी अरब के एशिया को होने वाले तेल निर्यात पर पड़ता है।

हूती विद्रोहियों का पेंच

सऊदी अरब ने सात साल तक हूती विद्रोहियों को झुकाने की कोशिश की। उसने लगातार हवाई हमले किए, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। यमन में चला यह युद्ध हमारे दौर की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक था। इसके असर आज भी महसूस किए जा रहे हैं।

साल 2022 में सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच एक अस्थिर युद्धविराम पर सहमति बनी थी। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि इसके लिए आर्थिक समझौते भी किए गए थे।

लेकिन अब खाड़ी का सबसे अमीर देश सऊदी अरब फिर से दबाव में है। उसे दक्षिण में यमन की ओर से ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा है। साथ ही उत्तर में इराक की दिशा से भी हमलों का सामना करना पड़ रहा है। ‘विजन 2030’ की योजना बनाते समय ऐसी स्थिति की कल्पना शायद नहीं की गई थी।