अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार रात एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि चीन ने अमेरिकी चुनावी डेटा में अब तक की सबसे बड़ी सेंध लगाई है। यह दावा उन्होंने व्हाइट हाउस से दिए गए एक प्राइमटाइम भाषण में किया।

ट्रंप ने कहा कि सालों तक अमेरिकियों से चुनावी इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा को लेकर झूठ बोला गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें और वोट गिनने वाले सिस्टम शामिल हैं। उन्होंने इसे “अस्वीकार्य कमजोरी” बताया।

राष्ट्रपति ने अमेरिकी इंटेलिजेंस कम्युनिटी की गोपनीय रिपोर्ट्स को सार्वजनिक करने का ऐलान किया। ये रिपोर्ट्स जनवरी 2020 से जून 2026 के बीच की हैं। ट्रंप के मुताबिक, इनसे साबित होता है कि सरकार को लंबे समय से पता था कि चुनावी सिस्टम हमलों के सामने कमजोर है।

किन देशों पर शक

रिपोर्ट के हवाले से ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के विरोधी देशों के पास चुनावी इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है। इनमें रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया का नाम लिया गया। साथ ही कुछ गैर-सरकारी समूहों पर भी शक जताया गया है।

व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस दावे की पुष्टि की। पोस्ट में लिखा गया कि 2020 के चुनाव से शुरू होकर कई सालों तक चीन ने चुनावी डेटा में सबसे बड़ी सेंध लगाई। इस सेंध से चीन ने गैर-कानूनी तरीके से अमेरिका के 22 करोड़ (220 मिलियन) वोटरों की जानकारी हासिल की।

किस तरह का डेटा चोरी हुआ

व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह डेटा 18 राज्यों के वोटरों का था। इसमें नाम, पता, फोन नंबर, वोटिंग हिस्ट्री, पार्टी प्राथमिकता और सैन्य सेवा से जुड़ी जानकारी शामिल है। प्रशासन का कहना है कि यह डेटा खरीदा, चुराया या हैक किया गया, और चीन ने इसके लिए एक खास यूनिट तैनात की थी।

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह दावा इस बात पर आधारित नहीं है कि 2020 के चुनाव में वोट बदले गए या मशीनें हैक हुईं। मामला सिर्फ वोटर रजिस्ट्रेशन डेटा तक सीमित बताया जा रहा है।

विवाद और सवाल

कई विशेषज्ञ इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं। अमेरिका में वोटर डेटा अक्सर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है। उदाहरण के लिए, नॉर्थ कैरोलाइना राज्य अपना वोटर डेटा ऑनलाइन ही प्रकाशित करता है। ऐसे में सार्वजनिक डेटा तक पहुंच का मतलब यह नहीं कि इससे चुनावी धोखाधड़ी की जा सकती है।

गौरतलब है कि 2020 में डिक्लासिफाई की गई एक पुरानी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि चीन ने कुछ राज्यों का वोटर रजिस्ट्रेशन डेटा हासिल किया था। उस समय यह डेटा जनमत विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई थी, न कि चुनावी धोखाधड़ी के लिए।

इंटेलिजेंस विशेषज्ञ जनमत को प्रभावित करने वाली गतिविधियों और चुनावी इंफ्रास्ट्रक्चर में सीधी सेंध के बीच फर्क करते हैं। रूस और ईरान पहले भी फर्जी सूचनाएं फैलाकर अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन यह वोटिंग सिस्टम में सीधी घुसपैठ से अलग माना जाता है।

आगे क्या

ट्रंप प्रशासन अब उन राज्यों से संपर्क कर रहा है जिनका डेटा प्रभावित बताया गया है। राष्ट्रपति ने कांग्रेस से चुनावी सुरक्षा से जुड़े कानून को पास करने की भी अपील की।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जारी किए गए दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच में यह दावे कितने ठोस साबित होते हैं, और चीन इस आरोप पर क्या प्रतिक्रिया देता है।