हिंदी और उर्दू साहित्य के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती केवल उनके जन्म का स्मरण भर नहीं, बल्कि उस लेखक को याद करने का अवसर है जिसने अपनी कलम को कभी सत्ता, धन या लोकप्रियता के हाथों गिरवी नहीं रखा। 31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद ने अपने साहित्य में भारतीय समाज की सच्चाइयों, किसानों की पीड़ा, स्त्रियों के संघर्ष और आम आदमी के जीवन को अभूतपूर्व संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने फ़िल्मों की चमक-दमक से भरी दुनिया को भी इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि उनकी दृष्टि में लेखक की सबसे बड़ी पूँजी उसकी स्वतंत्र चेतना होती है। मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर प्रस्तुत यह प्रसंग उस दौर की एक ऐसी सच्ची कहानी है, जो बताती है कि एक महान लेखक की पहचान उसकी प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने के साहस से होती है।

समुद्र का अपना एक स्वभाव होता है। वह जितना बाहर से चंचल दिखाई देता है, भीतर उतना ही गंभीर होता है। बंबई का समुद्र भी उन दिनों वैसा ही था। अनगिनत सपनों को अपनी लहरों पर बिठाकर किनारे तक ले आता और फिर किसी एक झटके में बता देता कि हर चमक मोती नहीं होती।

सन 1934 की एक साँझ थी। विक्टोरिया टर्मिनस से बाहर निकलते ही शहर अपनी समूची चकाचौंध के साथ आँखों में उतर आता था। ट्रामों की घंटियाँ, मोटरों का शोर, मिलों की सीटी, और उन सबसे ऊपर, सिनेमा के रंगीन पोस्टर मानो पूरा नगर एक ऐसे स्वप्न का अभिनय कर रहा हो, जिसमें दुःख के लिए कोई स्थान न हो।

उसी नगर में एक मनुष्य उतरा था, सादा धोती, साधारण कुरता, हाथ में छोटा-सा बस्ता। यदि कोई उसे भीड़ में देखता तो शायद दूसरी बार मुड़कर न देखता। किंतु वही साधारण-सा मनुष्य अपने भीतर पूरे भारत का गाँव लेकर चल रहा था। वह कोई और नहीं, इतिहास के एक महान कहानीकार मुंशी प्रेमचंद जी थे।

उनकी आँखों में न समुद्र से सपने बसते थे, न महलों की आकांक्षा। वहाँ तो अब भी वही कच्चे आँगन थे, जिनमें धूप के साथ भूख भी उतरती थी। वही किसान थे, जिनके पाँव की बिवाइयों में धरती का इतिहास लिखा था, वही स्त्रियाँ थीं, जिनकी चुप्पी किसी भी शोर से अधिक मुखर थी।

बंबई ने उनका स्वागत किया। एक प्रतिष्ठित फ़िल्म कंपनी ने उन्हें कहानी और संवाद लिखने के लिए बुलाया था। वेतन इतना था कि वर्षों से घर के द्वार पर बैठी चिंता शायद पहली बार मुस्करा सकती थी। परिवार को राहत मिलती, जीवन कुछ सरल हो जाता।

किंतु जीवन कभी केवल रोटी से नहीं चलता। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी भूख पेट से अधिक आत्मा की होती है।

स्टूडियो एक विचित्र संसार था। विशाल हॉल, कृत्रिम महल, नक़ली गाँव, काग़ज़ के पेड़, रंगी हुई दीवारें। जहाँ रात को दिन और दिन को रात बना देने की कला सीखी जाती थी। वहाँ सब कुछ संभव था, सिवाय सत्य के।

प्रेमचंद जब कहानी सुनाते, उनके पात्र धीरे-धीरे साँस लेने लगते। वे किसी किसान को रचते तो उसकी पीठ पर बरसों का श्रम उतर आता। किसी स्त्री को लिखते तो उसकी आँखों में अनगिनत अनकहे बरस तैरने लगते।

पर बैठक समाप्त होते-होते कोई कह उठता…

“दुःख थोड़ा कम कर दीजिए।”

“अंत सुखद होना चाहिए।”

“दर्शक रोना नहीं चाहते।”

“यह संवाद बहुत गंभीर है।”

ये वाक्य छोटे थे, पर हर बार उनकी कलम से एक महीन-सा तंतु टूट जाता।

उन्हें पहली बार लगा कि यहाँ कहानी नहीं लिखी जाती, कहानी सजाई जाती है, जैसे किसी थके हुए चेहरे पर अनिवार्य मुस्कान का रंग पोत दिया गया हो।

एक दिन उन्होंने स्टूडियो से बाहर निकलकर समुद्र को देर तक देखा।

लहरें बार-बार आतीं, किनारे को छूतीं और लौट जातीं।

उन्हें अचानक अपने गाँव याद आए।

उन्हें लगा, समुद्र की यह अथाह नीलिमा भी उस किसान की आँखों जितनी गहरी नहीं, जिसने फसल चौपट होने पर भी अगले वर्ष बीज बचाकर रखे थे।

उन्हें लगा, यह शहर बहुत कुछ दे सकता है, धन, प्रसिद्धि, सम्मान, पर वह वह एक वस्तु नहीं दे सकता, जिसके बिना लेखक जीवित नहीं रहता।

स्वतंत्रता।

लेखक की स्वतंत्रता।

उन्होंने फ़िल्म “मज़दूर” के लेखन में अपना योगदान दिया। उन्हें संतोष था कि श्रमिकों का जीवन पर्दे तक पहुँचेगा। किंतु धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि चलचित्र की दुनिया अनेक समझौतों से चलती है। वहाँ सत्य को भी कई बार इस तरह सँवारना पड़ता है कि वह पहचान में न आए। यह उनके स्वभाव में नहीं था।

जिस मनुष्य ने किसानों की दरिद्रता को अलंकार नहीं बनने दिया, वह अपनी रचना को भी बाज़ार की वस्तु कैसे बनने देता?

निर्णय उन्होंने चुपचाप लिया।

न कोई घोषणा, न कोई शिकायत।

जिस प्रकार कोई साधु मेला समाप्त होने पर अपना कमंडल उठाकर अगली यात्रा पर निकल पड़ता है, उसी प्रकार प्रेमचंद भी बंबई से लौट पड़े।

लोगों ने कहा, “इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दी?”

किसी ने कहा,”थोड़ा समझौता कर लेते तो क्या बिगड़ जाता?”

पर कुछ निर्णय तर्क से नहीं, आत्मा से लिए जाते हैं।

वे लौट आए।

फिर वही काग़ज़, वही स्याही, वही अभाव, वही संघर्ष।

पर लौटकर उनकी कलम फिर से वैसी ही हो गई, निर्भीक, निष्कलुष, मनुष्य के दुःख में भीगती हुई।

बाद के वर्षों में उन्होंने जो लिखा, वह केवल साहित्य नहीं, भारत की अंतरात्मा का दस्तावेज़ बन गया। ‘गोदान’ का होरी, ‘कफ़न’ का घीसू-माधव, ‘ईदगाह’ का हामिद। ये पात्र इसलिए अमर हुए कि उनके रचयिता ने उन्हें किसी बाज़ार की माँग के अनुसार नहीं, जीवन के सत्य के अनुसार जन्म दिया।

आज जब सफलता का अर्थ प्रायः चमक, प्रसिद्धि और ऊँचे पारिश्रमिक से लगाया जाता है, तब प्रेमचंद की वह वापसी एक शांत दीपक की तरह दिखाई देती है।

उस दीपक ने कभी आतिशबाज़ी की तरह आकाश नहीं भरा, पर उसने अँधेरे में बैठे करोड़ों लोगों के चेहरे पहचानने लायक उजाला अवश्य दिया।

शायद इसी कारण बंबई की उस समय की अनेक चर्चित फ़िल्मों के नाम इतिहास की धूल में धुँधले पड़ गए, किंतु एक साधारण धोती पहने लेखक की स्याही आज भी नहीं सूखी।

क्योंकि कुछ लोग अपने समय के लिए नहीं लिखते।

वे आने वाले समय की आत्मा में अपना घर बना लेते हैं।