मोबाइल और स्क्रीन के इस्तेमाल से दिमाग़ पर पड़ने वाले असर की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन हाथ की छोटी उंगली पर बनी एक सख़्त गांठ ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया. यह गांठ ठीक उसी जगह थी जहां फ़ोन को पकड़ा जाता है.
इसी सवाल का जवाब जानने के लिए कई विशेषज्ञों से बातचीत की गई. नई वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि मोबाइल फ़ोन और दूसरे डिजिटल डिवाइस शरीर में कई तरह के बदलाव ला सकते हैं.
ये गर्दन के आकार को प्रभावित करते हैं, आंखों को नुक़सान पहुंचाते हैं, हाथों की गतिविधियों पर असर डालते हैं और मांसपेशियों की ताक़त कम कर सकते हैं.
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक पर बढ़ती निर्भरता चेहरे की झुर्रियों को भी बढ़ावा दे सकती है. चिंता की बात यह है कि इन शारीरिक दिक्कतों के चलते आगे चलकर याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में कमी जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आ सकती हैं.
रीढ़ की हड्डी पर असर

लंबे समय तक बैठे रहने की आदत भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है. राहत की बात यह है कि इन असर को कम करने के लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं.
फ़ोन पर कोई लेख पढ़ते समय अक्सर सिर नीचे की ओर झुका होता है. सिर को आगे की तरफ़ झुकाकर रखने की इस मुद्रा को “फ़ॉरवर्ड हेड पोस्चर” कहा जाता है. इससे गर्दन पर 27 किलोग्राम तक का दबाव पड़ सकता है.
समय के साथ यह दबाव रीढ़ की हड्डी की डिस्क को नुक़सान पहुंचाता है, जोड़ों और मांसपेशियों को कमज़ोर करता है और फेफड़ों की क्षमता को भी घटा सकता है. इस समस्या को “टेक नेक” नाम दिया गया है, जो शरीर के दिखने के तरीके को स्थायी रूप से बदल सकती है.
डॉक्टर की सलाह से किए गए कुछ ख़ास व्यायाम इस समस्या को ठीक करने में मददगार साबित होते हैं. इसके अलावा रोज़मर्रा में कुछ छोटे बदलाव भी फ़ायदा पहुंचा सकते हैं. फ़ोन को थोड़ा ऊपर उठाकर रखना चाहिए, ताकि स्क्रीन आंखों के लेवल पर रहे.
फ़ोन चेहरे से क़रीब एक हाथ की दूरी पर रखना बेहतर होता है, और यही सलाह कंप्यूटर मॉनिटर के लिए भी लागू होती है. विशेषज्ञों के अनुसार बीच-बीच में स्क्रीन से ब्रेक लेना भी असरदार रहता है. हर आधे घंटे के इस्तेमाल के बाद कुछ मिनट का ब्रेक लेने की आदत डालनी चाहिए.
त्वचा में जलन और गर्दन पर झुर्रियां

हाल के समय में एक नई बहस छिड़ी है कि क्या टेक नेक की वजह से गर्दन पर झुर्रियां पड़ रही हैं. ब्रिटेन की रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस से जुड़ी सलाहकार त्वचा विशेषज्ञ जस्टीन हेक्सटॉल के मुताबिक़, थ्योरी के हिसाब से यह बात समझ में आती है, क्योंकि बार-बार पड़ने वाला दबाव झुर्रियों की एक वजह बनता है और लगातार आगे झुककर गर्दन मोड़े रखना इसी दबाव को बढ़ाता है.
हालांकि उनका कहना है कि अभी तक किसी ठोस रिसर्च ने इस बात की पुष्टि नहीं की है, और इसी वजह से वे ऑनलाइन बिकने वाले किसी भी ख़ास “टेक नेक” उत्पाद को ख़रीदने की सलाह नहीं देतीं.
इसके बजाय त्वचा से जुड़ी दूसरी दिक्कतें ज़्यादा चिंता का विषय हैं, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो अपनी स्मार्टवॉच कभी नहीं उतारते. हेक्सटॉल बताती हैं कि घड़ी के नीचे बना अंधेरा और नमी भरा माहौल यीस्ट के पनपने के लिए अनुकूल होता है, जिससे त्वचा में जलन या एक्ज़िमा जैसी समस्या हो सकती है.
इससे त्वचा की सुरक्षा परत को नुक़सान पहुंचता है, जिसके चलते निकेल, रबर, लेटेक्स और एक्रिलेट्स जैसे रसायनों को लेकर संवेदनशीलता भी बढ़ सकती है. इसका समाधान बेहद सरल है, स्मार्टवॉच को बार-बार उतारना और त्वचा को धोते रहना. जो लोग पूरे दिन घड़ी पहनते हैं, उन्हें बैरियर क्रीम का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है.
नज़र कमज़ोर होना

पिछले कई दशकों में मायोपिया के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी गई है, यानी नज़दीक की चीज़ें साफ़ दिखना और दूर की चीज़ें धुंधली नज़र आना. इस दौरान हुए बदलावों को देखते हुए तकनीक को इसका ज़िम्मेदार मानना स्वाभाविक लगता है.
अमेरिका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में ऑप्टोमेट्री के प्रोफेसर डोनाल्ड मट्टी के मुताबिक़ यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, मगर शायद उस तरीके से नहीं जिस तरह आमतौर पर सोचा जाता है.
मट्टी और उनकी टीम ने बच्चों की आंखों के विकास पर 20 साल से ज़्यादा समय तक अध्ययन किया और मायोपिया के शुरू होने तथा बढ़ने के जोखिम को परखा. इस दौरान अहम सवाल यह था कि क्या मायोपिया का संबंध “क्लोज़ वर्क” यानी फ़ोन जैसी चीज़ों पर बहुत पास से ध्यान केंद्रित करने वाले कामों से है.
मट्टी के मुताबिक़ जवाब में ऐसा कोई सीधा संबंध सामने नहीं आया. मगर अध्ययन में एक अहम बात यह निकली कि बाहर बिताया गया समय आंखों के लिए फ़ायदेमंद साबित होता है. माना जाता है कि बाहर की तेज़ रोशनी रेटिना से डोपामीन के स्राव को बढ़ाती है, जो आंखों के विकास के तरीके को प्रभावित करता है.
तकनीक ने जीवनशैली को इस तरह बदल दिया है कि अब पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा समय घर के भीतर बीतने लगा है, और यही अप्रत्यक्ष रूप से आंखों पर बुरा असर डाल सकता है. मट्टी के अनुसार इसका समाधान बेहद आसान है, बाहर ज़्यादा समय बिताना. इससे न सिर्फ़ आंखों को फ़ायदा होता है बल्कि नींद की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
हाथों का कमज़ोर होना

आजकल ग्रिप स्ट्रेंथ को पूरे शरीर की सेहत का एक अहम संकेतक माना जाने लगा है. एक अध्ययन में यह भी सामने आया कि यह ब्लड प्रेशर से भी बेहतर तरीक़े से जल्दी मृत्यु के जोखिम का अनुमान लगा सकती है.
कई देशों में, ख़ासकर युवाओं के बीच, ग्रिप स्ट्रेंथ लगातार घटती जा रही है. जर्मनी की मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़िट्ज़ में मेडिकल सोशियोलॉजी के प्रोफेसर योहानेस बेलर के मुताबिक़, एक पूरी पीढ़ी में दिख रही यह कमज़ोरी सिर्फ़ हाथों की बात नहीं है, बल्कि यह युवा पीढ़ी के भविष्य की सेहत को लेकर एक शुरुआती चेतावनी भी हो सकती है.
उनका मानना है कि कंप्यूटर आधारित और लंबे समय तक बैठे रहने वाले कामों की ओर बढ़ता रुझान शारीरिक फिटनेस में गिरावट की एक बड़ी वजह बन रहा है, और इसी का असर ग्रिप स्ट्रेंथ पर भी पड़ रहा है.
एक सामान्य पैमाने के तौर पर एक टेनिस बॉल को पूरी ताक़त से दबाकर 15 से 30 सेकंड तक पकड़ बनाए रखने की क्षमता होनी चाहिए. मगर असली मक़सद सिर्फ़ हाथों की पकड़ मज़बूत करना नहीं, बल्कि पूरी शारीरिक फिटनेस को बेहतर बनाना है, जिसके लिए नियमित व्यायाम और जिम जाने की आदत को अपनी दिनचर्या में शामिल करना ज़रूरी है.
हैंड-आई कोऑर्डिनेशन

तकनीक का असर मोटर स्किल्स पर भी पड़ता दिख रहा है, यानी शरीर और दिमाग़ को मिलाकर सटीक गतिविधियां करने की क्षमता पर. जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ रेगेन्सबर्ग में डेवलपमेंट साइकोलॉजी और एजुकेशन के प्रोफेसर सेबेस्टियन सुगेट के मुताबिक़ अभी तक मिले प्रमाण तकनीक के मोटर स्किल्स पर नकारात्मक असर की ओर इशारा करते हैं.
बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में वयस्कों की तुलना में कहीं ज़्यादा जानकारी मौजूद है. सुगेट के अपने शोध से यह भी पता चलता है कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम और कमज़ोर मोटर स्किल्स के बीच सीधा संबंध है, हालांकि किशोरों की तुलना में बच्चों पर होने वाले असर के बारे में जानकारी कहीं अधिक है.
सुगेट यह नहीं कहते कि घबराने या स्क्रीन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत है. उनकी सलाह है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हाथों से जुड़े कामों को ज़्यादा से ज़्यादा शामिल किया जाए, जैसे खाना बनाना, लकड़ी का काम करना या हाथ से लिखने की आदत डालना.
सुगेट के मुताबिक़ यह दुनिया का अंत नहीं है और इसके असर बेहद सूक्ष्म हैं. मगर उनका कहना है कि भले ही व्यक्तिगत स्तर पर यह असर छोटा नज़र आए, कई पीढ़ियों में मिलाकर देखा जाए तो यह समाज की सोचने-समझने की क्षमता में संभावित गिरावट की तरफ़ इशारा करता है, क्योंकि हाथ ही दुनिया से संपर्क बनाने का एक बेहद अहम माध्यम हैं.

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.



