संसद का मॉनसून सत्र भी गतिरोध में फंसता नजर आ रहा है। नीट पेपर लीक का मुद्दा देश और संसद दोनों पर छाया हुआ है। विपक्ष आगबबूला है, या कम से कम वो ऐसा करते हुए दिखना चाहता है। ऐसे माहौल में सरकार वंदे मातरम् विधेयक लेकर आयी है। जिसे राष्ट्रवाद के अखाड़े में बीजेपी का धोबीपाट दांव कहा जा रहा है।

इसी बिगड़े हुए माहौल में शुक्रवार को केंद्र सरकार राज्यसभा में एक नया विधेयक लेकर आयी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पेश किया। राज्यसभा में भारी हंगामे के बीच यह बिल सदन के पटल पर रखा गया।

बिल पेश होने के दौरान इतना हंगामा हुआ कि सदन को चलाना संभव नहीं हो सका। एक बार फिर से उपसभापति हरिवंश नरायण सिंह को राज्यसभा की कार्यवाही को 27 जुलाई तक के लिए स्थागित करना पड़ा। यह लगातार पांचवां दिन था जब संसद की कार्यवाही टकराव की भेंट चढ़ गई।

क्या है वन्दे मातरम् विधेयक

राष्ट्रीय सम्मान के निरादर या अपमान से निपटने के लिए मौजूदा कानून 1971 में सामने आया था। लेकिन इस कानून का दायरा राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और संविधान तक सीमित है। इसमें राष्ट्रगान रोकने या बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान है।

नए बिल में कानून का विस्तार राष्ट्रगीत वंदे मातरम् तक किया गया है। यह बिल वंदे मातरम् को भी यही कानूनी दर्जा देने का प्रावधान करता है। अगर ये विधेयक पास होकर कानून का रूप लेता है तो वंदे मातरम् के गायन में जानबूझकर बाधा डालना या इसका अपमान करना भी आपराधिक दायरे में आ जाएगा। इसकी सजा भी तीन साल कैद या जुर्माना होगी।

सरकार इसे 24 जनवरी 1950 के एक पुराने वादे से जोड़ कर पेश कर रही है। उस दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम् को जन गण मन जितना ही मान-सम्मान मिलेगा। सरकार इसे कानून का रूप देने के पीछे इसी तर्क का इस्तेमाल कर रही है।

बहुत पुरानी है वंदे मातरम् पर बहस

वंदे मातरम् को लेकर सियासी बहस कोई नई बात नहीं है। इस पर होने वाली बहस 1937 से चली आ रही है, जब कांग्रेस ने आधिकारिक आयोजनों के लिए इस गीत के सिर्फ पहले दो अंतरे ही स्वीकार किए थे। बीजेपी उस फैसले को लेकर अक्सर कांग्रेस को घेरती आ रही है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी कर पूरे वंदे मातरम् को आधिकारिक मान्यता दे दी थी। विपक्ष का दावा है कि बीजेपी इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से तूल दे रही है। उनका कहना है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए इस विधेयक का इस्तेमाल कर रही है।

मोदी सरकार के राजनीतिक लक्ष्य: एक तीर से कई निशाने

इस बिल के जरिए सत्ता पक्ष एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश में है। पहला, नीट पेपर लीक पर आक्रामक विपक्ष को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर घेरना।

अगर विपक्ष बिल का विरोध करता है, तो बीजेपी उसे ‘राष्ट्रगीत विरोधी’ ठहराने का नैरेटिव बना सकती है। सरकार इससे हाल के मुद्दों से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई करने की जुगत में है।

दूसरा, सरकार  मॉनसून सत्र की बहस का रुख अपने अनुकूल मोड़ना चाहती है। वंदे मातरम् की रचना की 150वीं वर्षगांठ का मौका भी इसमें सरकार के काम आ रहा है।

इस बिल के जरिए बीजेपी अपने कोर वोटर तक सांस्कृतिक गौरव का संदेश पहुंचाना चाहती है, जो कि पार्टी की राजनीति का आधार है और यही उसकी राजनीतिक यूएसपी भी है।

विपक्ष के मुताबिक, ध्यान भटकाने की कोशिश

कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का आरोप है कि नीट घोटाला, बेरोजगारी और महंगाई जैसे असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए वंदे मातरम् को हथियार बनाया जा रहा है।

विपक्ष का यह भी कहना है कि अगर सरकार वाकई इस बिल को लेकर गंभीर होती, तो इसका मसौदा पहले विपक्षी दलों को दिखाया जाता। ऐसा नहीं हुआ। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि राष्ट्रभक्ति दिल से आती है, कानून या सजा के डर से जबरन नहीं थोपी जा सकती।

सदन में विपक्ष ने बिल के विरोध में प्रस्ताव भी लाने का प्रयास किया, लेकिन फिलहाल इसे ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया।

राज्यसभा अब 27 जुलाई को दोबारा बैठेगी, और तभी इस बिल पर असली बहस शुरू होने की उम्मीद है। सवाल अब यह है कि क्या सरकार नीट विवाद से ध्यान हटाने में कामयाब होती है, या फिर विपक्ष का हंगामा वंदे मातरम् बिल को भी उसी टकराव में खींच ले जाता। जिसमें मॉनसून सत्र अब तक फंसा हुआ है।