दुनिया में संसदीय लोकतंत्र का जनक माने जाने वाला ब्रिटेन (यूनाइटेड किंगडम) एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जो उसके आठ सौ साल पुराने राजनैतिक और कानूनी ढांचे की नींव हिला सकता है। देश के भीतर लगातार उठती आवाज़ों और प्रधानमंत्री की ओर से मिले संकेतों के बाद ब्रिटेन में एक लिखित (कोडीफाइड) संविधान लागू करने पर बहुत बड़ी बहस छिड़ती दिखाई दे रही है।
अगर यह बदलाव धरातल पर उतरता है, तो आधुनिक इतिहास में यह पहला मौका होगा जब ब्रिटेन अपनी पारंपरिक और बिखरी हुई संवैधानिक व्यवस्था को त्यागकर भारत या अमेरिका की तर्ज पर एक ही दस्तावेज़ में अपना संविधान पिरोएगा। लेकिन ये रास्ता आसान नहीं है।
क्या है ब्रिटेन की मौजूदा अनूठी व्यवस्था
आम तौर पर जब हम किसी देश के संविधान की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में भारत के संविधान जैसी एक मोटी किताब आती है। जिसमें नागरिक अधिकार, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की शक्तियां और न्यायपालिका के नियम साफ़-साफ़ लिखे होते हैं।
लेकिन ब्रिटेन इस मामले में पूरी दुनिया से अलग है। यूके के पास ऐसी कोई एकल संवैधानिक किताब नहीं है। वैसे तो इस देश के संविधान को “अलिखित” कहा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह पूरी तरह से अलिखित है नहीं। अलिखित की जगह इसे “अन-कोडीफाइड” कहना ज्यादा सही होगा।
ब्रिटेन का शासन मुख्य रूप से चार चीज़ों पर टिका है
- संसदीय अधिनियम: संसद द्वारा अलग-अलग सदियों में पास किए गए बड़े कानून।
- कॉमन लॉ: ब्रिटेन की शीर्ष आदालतों द्वारा वर्षों से दिए गए ऐतिहासिक फैसले।
- संवैधानिक परंपराएं: वे अलिखित नियम जो कानून तो नहीं हैं, लेकिन सदियों से चले आ रहे हैं (जैसे प्रधानमंत्री का हमेशा हाउस ऑफ कॉमन्स यानी निचले सदन से ही होना)।
- ऐतिहासिक दस्तावेज: राजाओं और संसद के बीच हुए पुराने समझौते।
तीन ऐतिहासिक मील के पत्थर
ब्रिटेन का वर्तमान राजनैतिक ढांचा रातों-रात नहीं बना, बल्कि यह 800 साल के लंबे इतिहास का नतीजा है। इसमें तीन ऐतिहासिक घटनाओं और दस्तावेजों का सबसे बड़ा हाथ रहा है।
1. मैग्ना कार्टा (1215)
साल 1215 में ब्रिटेन के राजा किंग जॉन की तानाशाही से तंग आकर वहां के सामंतों ने उन्हें एक समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया। इसे मैग्ना कार्टा या “महान अधिकार पत्र” कहा गया। इसने पहली बार यह सिद्धांत तय किया कि “राजा कानून से ऊपर नहीं है” और किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के बिना बंदी नहीं बनाया जा सकता।
2. बिल ऑफ राइट्स (1689)
17वीं सदी में राजा और संसद के बीच खूनी संघर्ष हुआ। इसके बाद 1689 में ‘बिल ऑफ राइट्स’ आया, जिसने राजा से शक्तियां छीनकर संसद को दे दीं। इसी कानून से तय हुआ कि संसद की मंजूरी के बिना राजा टैक्स नहीं लगा सकता, चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र होंगे और संसद में बोलने की आजादी (संसदीय विशेषाधिकार) रहेगी।
3. संवैधानिक सुधार अधिनियम (2005)
ब्रिटेन में सदियों से लॉर्ड चांसलर नाम का पद ही कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों का हिस्सा होता था। लेकिन 2005 के कानून के जरिए ब्रिटेन में पहली बार न्यायपालिका को सरकार और संसद से पूरी तरह अलग किया गया। इसी कानून के तहत अक्टूबर 2009 में ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई, जिससे पहले लॉर्ड्स सदन ही सबसे बड़ी अदालत हुआ करता था।
लिखित संविधान की मांग क्यों उठी
ब्रिटेन में पिछले कुछ दशकों, खासकर ब्रेक्जिट के बाद से, कई ऐसी राजनैतिक परिस्थितियां बनी हैं जिन्होंने इस अलिखित व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
ब्रिटेन में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की अपनी क्षेत्रीय संसद और सरकारें हैं। इसके अलावा मैनचेस्टर या लिवरपूल जैसे बड़े शहरों के पास अपने मेयर हैं। अलिखित संविधान होने के कारण अक्सर केंद्र (लंदन) और क्षेत्रीय सरकारों के बीच अधिकारों और फंड्स को लेकर खींचतान चलती रहती है।
इसके अलावा यूके के कानून में सिद्धांत है कि संसद जो चाहे कानून बना सकती है और उसे कोई कोर्ट रद्द नहीं कर सकता (जब तक कि वह खुद कानून न बदले)। इससे कई बार सरकार के तानाशाही पूर्ण फैसले लेने का डर बना रहता है।
यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने के बाद ब्रिटेन के कई पुराने नियम और नागरिक अधिकार अधर में लटक गए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब नागरिकों के मौलिक अधिकारों को एक मजबूत कानूनी ढाल की जरूरत है।
लिखित संविधान में सबसे बड़ी रुकावटें
भले ही इसे लागू करने की मांग जोर पकड़ रही हो, लेकिन ब्रिटेन के लिए लिखित संविधान बनाना आसान नहीं होगा।
अगर लिखित संविधान बनता है, तो संविधान सर्वोच्च हो जाएगा और सुप्रीम कोर्ट को संसद के बनाए कानूनों को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार मिल जाएगा। ब्रिटिश सांसद अपनी यह असीम ताकत आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं होंगे।
इसके साथ ही एक बात ये भी महत्वपूर्ण है कि स्कॉटलैंड में अलगाववादी आंदोलन हमेशा मजबूत रहा है। वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की अपनी कानूनी जटिलताएं हैं। चारों राज्यों को एक ही संवैधानिक मसौदे पर सहमत करना एक बहुत बड़ी राजनैतिक चुनौती होगा।
इसके अलावा ब्रिटेन में राजा/रानी भले ही नाममात्र के प्रमुख हों, लेकिन उनका पद और अधिकार सदियों पुरानी परंपराओं पर टिके हैं। लिखित संविधान में राजशाही के अधिकारों को फिर से परिभाषित करना एक संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।
किस ओर जा सकती है ये बहस
ब्रिटिश प्रधानमंत्री और कानूनविदों द्वारा दिए गए संकेत इस बात का प्रमाण हैं कि ब्रिटेन अब पुरानी परंपराओं के भरोसे देश चलाने के बजाय एक पारदर्शी और आधुनिक व्यवस्था अपनाना चाहता है।
आने वाले दिनों में इस पर एक राष्ट्रीय बहस शुरू हो सकती है और संसद की विशेषज्ञ समितियां अलग-अलग हितधारकों से परामर्श करके एक नया संवैधानिक ढांचा तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा राजनैतिक और कानूनी सुधार माना जाएगा।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




