अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव के बावजूद, ईरान के नीति निर्माता अभी भी जंग खत्म करने को लेकर जल्दबाजी में नहीं दिख रहे हैं।
ईरान शायद यह दिखाना चाहता है कि जंग की दिशा अकेले अमेरिका तय नहीं कर सकता। ईरान को शायद यह भी उम्मीद है कि वह अमेरिका पर सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक बोझ बढ़ाकर उसे अपनी कुछ मांगें मनवाने पर मजबूर कर सकता है।
लेकिन बहुत कुछ एक अहम सवाल पर टिका है: ईरान यह जंग कब तक जारी रख सकता है?
ईरान जंग को कितना लंबा खींच सकता है
इस जंग में ईरान की डिफेंस इंडस्ट्री और मिसाइल उत्पादन फैसिलिटीज के कुछ हिस्सों को निशाना बनाया गया। लेकिन नुकसान का सही अंदाजा लगाने वाला कोई स्वतंत्र आंकड़ा मौजूद नहीं है।
चैटम हाउस थिंक टैंक ने अपने ताजा आकलन में कहा है कि ईरान के मौजूदा मिसाइल भंडार का कोई भरोसेमंद आंकड़ा नहीं है।
समय के साथ ईरान की ओर से दागी जाने वाली मिसाइलों की संख्या कम हुई है। लेकिन जंग जारी रखने की क्षमता सिर्फ मिसाइलों की गिनती से नहीं आंकी जा सकती। असल में ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का उत्पादन अब आसान और तेज हो गया है। अब तक मारे गए कमांडरों की जगह नए कमांडर तैनात हो चुके हैं। इसके अलावा, कमान ढांचा अभी भी बरकरार है।
जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लेक्चरर मोहम्मद गाएदी कहते हैं, “ईरान संभवतः लंबे समय तक मिसाइल दागने की अपनी क्षमता बनाए रख सकता है। हालांकि इसकी तीव्रता कम हो सकती है, और यह होर्मुज स्ट्रेट में बाधा पैदा कर सकता है।”
ईरानी नीति निर्माताओं का मानना है कि लंबा संघर्ष अमेरिका को भी नुकसान पहुंचा सकता है। ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने में अमेरिका के डिफेंस रिजर्व का एक हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। कुछ अमेरिकी अनुमानों में यह चेतावनी भी दी गई है कि इन हथियारों की भरपाई जल्दी नहीं हो सकती।
गाएदी यह भी कहते हैं, “तेल की कीमतों पर जंग के असर और अमेरिका की घरेलू राजनीतिक हालात ने तेहरान में यह उम्मीद जगा दी है कि वह वॉशिंगटन को अपनी कुछ शर्तें मानने पर मजबूर कर सकता है।”
घरेलू स्तर पर, रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन अभी भी मजबूत है। लेकिन सर्वे इस जंग को लेकर अमेरिकियों में बढ़ती नाराजगी दिखाते हैं। साथ ही इस चिंता को भी कि ट्रंप युद्ध का अपना मकसद हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
अगर तेहरान का अनुमान सही है, तो ईरान के लिए अमेरिका को सैन्य रूप से हराना जरूरी नहीं है। एक लंबा और महंगा युद्ध भी दबाव बनाने का एक तरीका हो सकता है। फिलहाल कोई ऐसा संकेत नहीं है। सिर्फ सैन्य दबाव से ईरान जंग रोकने पर मजबूर हो जाएगा, ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
ईरान की अर्थव्यवस्था कब तक टिक पाएगी
जंग शुरू होने से पहले ही ईरान की अर्थव्यवस्था महंगाई, कम निवेश, अपनी मुद्रा रियाल में भारी गिरावट और गहरे संरचनात्मक असंतुलन से जूझ रही थी।
विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक, 2025-26 वित्त वर्ष में ईरान की अर्थव्यवस्था में करीब 2.7% की गिरावट आई। जंग ने नए दबाव जोड़ दिए हैं। ईरान के सांख्यिकी केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक, 12 महीने की महंगाई दर 62% तक पहुंच गई है।
जंग से सबसे ज्यादा प्रभावित दक्षिणी प्रांतों में यह असर सबसे बुरा रहा है। उदाहरण के तौर पर, होर्मोजगान में महंगाई दर 101% से ऊपर पहुंच गई है।
ईरान के उप श्रम मंत्री के मुताबिक, जंग के कारण रोजगार बाजार में 10 लाख से ज्यादा नौकरियां खत्म हो गईं। करीब 20 लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से बेरोजगार हो गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ का भी अनुमान है कि 2026 में ईरान की अर्थव्यवस्था में करीब 5.4% की गिरावट आएगी। साथ ही महंगाई दर 69% के करीब पहुंच जाएगी।
जंग कितने समय चलेगी, और इससे व्यापार और तेल निर्यात कितना प्रभावित होगा, इसका असर बहुत बड़ा होगा। होर्मुज स्ट्रेट एक तरफ दबाव बनाने का हथियार है, तो दूसरी तरफ खतरे की जड़ भी है। इस रास्ते में बाधा से अमेरिका और वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए जंग की कीमत बढ़ सकती है। वहीं अमेरिका की नौसैनिक नाकाबंदी और शिपिंग पर लगे प्रतिबंधों से ईरान के लिए तेल निर्यात करना भी मुश्किल हो जाता है।
फिर भी आर्थिक दबाव से बदलाव आना जरूरी नहीं है। गाएदी कहते हैं कि निरंकुश सरकारें बेहद कठिन आर्थिक हालात में भी सालों तक टिकी रह सकती हैं। उनके मुताबिक, महंगाई, बेरोजगारी और ढांचागत असंतुलन नाराजगी तो बढ़ा सकते हैं। लेकिन व्यापक विरोध प्रदर्शन या सरकार के भीतर फूट पड़े बिना तेहरान की सैन्य नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा।
जंग को लेकर ईरान के अंदर बहस
सबसे बेहतर रास्ता क्या हो, इसे लेकर ईरान में मतभेद हैं।
संसद अध्यक्ष और ईरान के वार्ता प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख मोहम्मद बगर गालिबाफ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ईरान को लगातार चलने वाले संघर्षों में नहीं फंसना चाहिए। उन्होंने वार्ता के विरोधियों की भी आलोचना की है।
लेकिन संसद में ईरान के कट्टरपंथी प्रतिनिधि अमीरहोसेन साबेती ने कहा है कि भले ही अमेरिका ईरान की सभी शर्तें मान ले और समझौते पर दस्तखत कर दे, फिर भी युद्ध होगा।
इस असहमति को सिर्फ “युद्ध समर्थक” और “शांति समर्थक” गुटों में नहीं बांटा जा सकता। गालिबाफ यह भी कहते हैं कि वे ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेंगे जो ईरान के अधिकारों की रक्षा न करे। असली मतभेद इस बात पर है। लगातार दबाव से तेहरान को कितना फायदा मिल सकता है, और वह बिंदु कहां है जहां नुकसान, फायदे पर भारी पड़ने लगे।
जनता की क्या राय है, यह जानने के लिए कोई स्वतंत्र और भरोसेमंद जनमत सर्वेक्षण मौजूद नहीं है। सोशल मीडिया पूरे समाज की राय नहीं दिखाता।
लेकिन एक इंटरव्यू में, ईरान के विशेषज्ञ और जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के विजिटिंग फेलो हामिदरेजा अजीजी कहते हैं कि इस्लामिक गणराज्य के लिए “सबसे खतरनाक मोर्चा” आखिरकार उसका घरेलू मोर्चा हो सकता है। उनके मुताबिक इसकी वजह भीषण महंगाई, आर्थिक समस्याएं और देश के बुनियादी ढांचे पर पड़ता दबाव है।
जंग से बाहर निकलने की जरूरत
लंबी जंग से ईरान को क्षेत्रीय स्तर पर भी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
हाल के सालों में तेहरान ने खाड़ी के अरब देशों, खासकर सऊदी अरब के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की है। इन देशों में ठिकानों, बुनियादी ढांचे और समुद्री रास्तों पर लगातार हमले इन रिश्तों को पलट सकते हैं।
इन देशों ने अब तक तनाव घटाने और बातचीत की तरफ लौटने की कोशिश की है। लेकिन ईरान या उससे जुड़े सैन्य बलों के हमलों का खतरा जितना ज्यादा महसूस होगा, अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने और शायद ईरान के खिलाफ भी साथ आने की उनकी इच्छा उतनी ही तेज होगी।
किसी भी लंबी जंग से अमेरिका पर पड़ने वाला दबाव ईरान के लिए तभी मायने रखेगा, जब वह उस दबाव को बातचीत की मेज पर रियायतों में बदल सके। अभी यह साफ नहीं है कि ईरान को जंग का स्वीकार्य अंत देने वाला समझौता कैसा होगा। या ऐसा समझौता कैसे मुमकिन होगा, यह भी स्पष्ट नहीं है।
अजीजी कहते हैं, “ईरान की रणनीति में जो कमी है, वह यह है कि जंग के दौरान हासिल किए गए प्रभाव को स्थायी राजनीतिक फायदे में कैसे बदला जाए।”
“तेहरान ने यह तो दिखा दिया है कि वह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर सकता है और अमेरिका व उसके सहयोगियों पर दबाव डाल सकता है। लेकिन यह साफ नहीं है कि वह लंबे समय तक अमेरिका और खाड़ी देशों से टकराव में कैसे टिका रह सकता है।”
अब तक सैन्य, आर्थिक या राजनीतिक किसी भी अड़चन ने ईरान को जंग जारी रखने से नहीं रोका है। लेकिन जंग जितनी लंबी चलेगी, घरेलू आर्थिक दबाव उतना ही बढ़ेगा। साथ ही, ईरान के क्षेत्रीय रिश्ते उतने ही बिगड़ेंगे। इन नुकसानों की भरपाई कर सके ऐसा समझौता ढूंढना उतना ही मुश्किल होता जाएगा।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




