अमेरिका और ईरान की हालिया जंग ने आधुनिक युद्ध की तस्वीर बदल दी है। इस संघर्ष ने न केवल अमेरिका की सैन्य ताकत की कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि भविष्य का युद्ध किस दिशा में जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका के लंबी दूरी तक मार करने वाले इंटरसेप्टर और एयर डिफेंस मिसाइलों का भंडार काफी कम हो गया है। हालांकि पेंटागन और व्हाइट हाउस का दावा है कि उनके पास अभियान जारी रखने के लिए पर्याप्त हथियार मौजूद हैं, लेकिन इस कमी ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका को अपनी सैन्य रणनीति पर फिर से विचार करना होगा।

पश्चिम एशिया के देशों में ड्रोन साझेदारी

इसी संदर्भ में यूएस सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने “फाल्कन स्ट्राइक फोर्स” बनाने की घोषणा की है। यह मल्टीनेशनल फोर्स हवा, समुद्र और पानी के नीचे काम करने वाले ड्रोन से लैस होगी। इसमें अमेरिका के साथ उसके मध्य पूर्व सहयोगी देशों की भागीदारी होगी। सेंटकॉम का मकसद महंगे और अत्याधुनिक हथियारों पर निर्भरता घटाकर बड़ी संख्या में सस्ते और असरदार ड्रोन शामिल करना है। इस फोर्स की निगरानी और संचालन की जिम्मेदारी सेंटकॉम के स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के पास होगी।

नई रणनीति में “लूकास” ड्रोन सबसे चर्चित है। इसकी कीमत करीब 35 हजार डॉलर है और इसे जमीन, वाहन या युद्धपोत से लॉन्च किया जा सकता है। ईरान के खिलाफ “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” में इसका इस्तेमाल भी हुआ था। इसी तरह “कोर्सेयर” ड्रोन का इस्तेमाल बचाव मिशन और ईरान के नौसैनिक अड्डे पर हमले में किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सस्ते ड्रोन महंगे रक्षा तंत्र को चुनौती देने में सक्षम हैं और यही वजह है कि अमेरिका अब इन्हें अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बना रहा है।

अलग-अलग फैले ठिकानों पर जोर

फारस की खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब पहले से ज्यादा खतरे में हैं। कतर का अल-उदैद एयर बेस, बहरीन का फिफ्थ फ्लीट और कुवैत का कैंप अरिफजान ईरान की मिसाइलों और ड्रोन की रेंज में हैं। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े और स्थायी अड्डे अब आसानी से निशाना बन सकते हैं। इसलिए अमेरिका छोटे-छोटे और अलग-अलग जगहों पर फैले संसाधनों पर जोर दे रहा है, जैसे जमीन से लॉन्च होने वाले ड्रोन, छोटी नौकाएं और पानी के भीतर चलने वाले मानव रहित सिस्टम। इनका फायदा यह है कि इन्हें ढूंढना और निशाना बनाना मुश्किल होता है और अगर कुछ नष्ट भी हो जाएं तो नुकसान उतना बड़ा नहीं होता।

हालांकि इस योजना को लागू करना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती सहयोगी देशों को इस मल्टीनेशनल फोर्स में शामिल करना है। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर कोई देश उसके खिलाफ अमेरिकी हमलों में सहयोग करता है तो उसे इसके नतीजे भुगतने पड़ेंगे। यही वजह है कि कई अरब देश सीधे सैन्य अभियानों से दूरी बनाए रखना चाहेंगे और खुद को निगरानी, प्रशिक्षण या सुरक्षा तक सीमित रख सकते हैं। कुछ देश खुले तौर पर गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय गुप्त खुफिया सहयोग को तरजीह दे सकते हैं।

सस्ते ड्रोन बनाम मंहगी मिसाइलें

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने सहयोगी देशों के साथ मिलकर मानव रहित प्रणालियों का इस्तेमाल करने की कोशिश की हो। इससे पहले “टास्क फोर्स 59”, “रिप्लिकेटर” और “ड्रोन सुप्रीमेसी” जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए थे। इनका मकसद हजारों सस्ते और आसानी से बदले जा सकने वाले ड्रोन बनाना था। रक्षा मंत्री ने साफ कहा था कि अमेरिका हर बार सस्ते ड्रोन को गिराने के लिए करोड़ों डॉलर की मिसाइलें खर्च नहीं कर सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान के साथ संघर्ष ने भी यह दिखा दिया है कि कम लागत वाले ड्रोन आधुनिक युद्ध में बड़ा खतरा बन सकते हैं।

फाल्कन स्ट्राइक फोर्स को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की नई रणनीति की झलक है। इसका उद्देश्य है—महंगे हथियारों पर निर्भरता कम करना, सस्ते ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों को शामिल करना और सहयोगी देशों को साथ जोड़ना। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या अमेरिका इस योजना को जमीन पर उतार पाएगा और क्या सहयोगी देश ईरान के खिलाफ खुलकर उसका साथ देंगे।

आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि कोई भी सैन्य ठिकाना या प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकती। सस्ते एंटी-ड्रोन सिस्टम, बेहतर सुरक्षा और नकली उपकरणों का इस्तेमाल जोखिम को कम कर सकता है, लेकिन खतरा हमेशा बना रहेगा। यही वजह है कि अमेरिका अब अपनी सैन्य नीति को लचीला और बहुआयामी बनाने की कोशिश कर रहा है।

कुल मिलाकर, ईरान के साथ हुई जंग ने अमेरिका को यह समझा दिया है कि भविष्य का युद्ध महंगे हथियारों से नहीं, बल्कि सस्ते और बड़ी संख्या में तैनात किए जा सकने वाले ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों से लड़ा जाएगा। फाल्कन स्ट्राइक फोर्स इसी दिशा में उठाया गया कदम है, जो आने वाले समय में अमेरिका की सैन्य रणनीति को पूरी तरह बदल सकता है।