यह लेख 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हुए उसकी आज की प्रासंगिकता पर विचार करता है। लेखिका ममता दुबे बताती हैं कि गांधीजी का “अंग्रेजों भारत छोड़ो” और “करो या मरो” का नारा आज भी मौजूं है, बस लड़ाई का स्वरूप बदल गया है। तब चुनौती बाहरी थी, आज चुनौती भ्रष्टाचार, जातीय-धार्मिक वैमनस्य, हिंसा, अंधविश्वास, नशा और पर्यावरण की उपेक्षा जैसी भीतरी बुराइयों के रूप में मौजूद है। लेख नागरिकों से अपील करता है कि स्वतंत्रता सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है, और राष्ट्र निर्माण सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि हर नागरिक, शिक्षक, अभिभावक और युवा का दायित्व है। लेखिका इसे नए नारे में ढालती हैं: “करो, क्योंकि देश को तुम्हारी जरूरत है।”

8 अगस्त 1942। मुंबई का ग्वालिया टैंक मैदान। वातावरण में आजादी की बेचैनी थी और देश एक निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार था। महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्ट संदेश दिया—“अंग्रेजों भारत छोड़ो” और देशवासियों को मंत्र दिया—“करो या मरो।”

भारत छोड़ो आंदोलन केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था। यह उस आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति था, जो किसी भी राष्ट्र के लिए अनिवार्य होता है। भारत अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करना चाहता था। अंग्रेजी शासन से मुक्ति केवल सत्ता हासिल करने का प्रश्न नहीं थी, बल्कि स्वाभिमान, अधिकार और आत्मनिर्णय की लड़ाई थी।

आज 1942 की उस ऐतिहासिक घटना को याद करते हुए एक

सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है—क्या भारत छोड़ो आंदोलन की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है?

निश्चित रूप से नहीं।

समय बदल गया है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं और संघर्ष का स्वरूप भी बदल गया है। आज हमारे देश पर कोई विदेशी सत्ता शासन नहीं कर रही, लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं, जो हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को भीतर से कमजोर कर रही हैं।

आज हमें भ्रष्टाचार छोड़ना है, जातीय और धार्मिक वैमनस्य छोड़ना है, हिंसा और असहिष्णुता छोड़नी है। अंधविश्वास, नशा, पर्यावरण की उपेक्षा और सार्वजनिक जीवन के प्रति उदासीनता छोड़नी है।

1942 में चुनौती बाहर से थी, आज चुनौती का एक बड़ा हिस्सा हमारे भीतर है

तब अंग्रेजों की सत्ता भारत की प्रगति में बाधा थी, आज हमारी अपनी कमजोरियाँ विकास के रास्ते में खड़ी हैं। तब विदेशी शासन के विरुद्ध जनशक्ति एकजुट हुई थी, आज आवश्यकता है कि राष्ट्रहित के लिए नागरिक शक्ति जागृत हो।

गांधीजी का “करो या मरो” आज हमें किसी हिंसक संघर्ष का संदेश नहीं देता। लोकतंत्र में इसका अर्थ है—गलत को देखकर चुप मत रहो, अपने कर्तव्य से भागो मत और परिवर्तन की जिम्मेदारी किसी दूसरे के कंधे पर मत डालो।

हम अक्सर देश की समस्याओं के लिए सरकार, व्यवस्था या नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं। निश्चित रूप से शासन की अपनी जिम्मेदारियाँ हैं, लेकिन क्या एक नागरिक की कोई जिम्मेदारी नहीं?

सड़क पर कूड़ा फेंककर स्वच्छ भारत की बात करना, नियम तोड़कर व्यवस्था को दोष देना, भ्रष्टाचार की आलोचना करते हुए सुविधा के लिए रिश्वत देना, सोशल मीडिया पर बिना सत्यापन के अफवाह फैलाना—क्या ये सब उस स्वतंत्र भारत के सपने के अनुरूप हैं, जिसके लिए लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था?

स्वतंत्रता अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।

1942 में एक किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला और सामान्य नागरिक भी स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा बना था। आज भी राष्ट्र निर्माण केवल संसद और सरकारों का काम नहीं है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों में संवेदनशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करके, माता-पिता संस्कार देकर, युवा अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाकर और वरिष्ठ नागरिक अपने अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुँचाकर देश के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

आज का भारत तकनीक, विज्ञान, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल ऊँची इमारतों, बड़ी अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं मापी जाती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसके नागरिक कितने संवेदनशील, ईमानदार, जिम्मेदार और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने वाले हैं।

इसलिए आज भारत छोड़ो आंदोलन को याद करने का सबसे सार्थक तरीका केवल शहीदों को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके अधूरे सपनों को समझना भी है।

आज हमें कहना होगा

भ्रष्टाचार—भारत छोड़ो।

नफरत—भारत छोड़ो।

भेदभाव—भारत छोड़ो।

हिंसा—भारत छोड़ो।

अंधविश्वास—भारत छोड़ो।

पर्यावरण के प्रति उदासीनता—भारत छोड़ो।

और सबसे बढ़कर, अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता—भारत छोड़ो।

1942 में स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को आजाद कराने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। आज हमारी परीक्षा यह है कि हम उस आजादी को कितना सार्थक बना पाते हैं?

तब लड़ाई थी—भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने की।

आज लड़ाई है—भारत को उसकी कमजोरियों से मुक्त कराने की

तब नारा था—“करो या मरो।”

आज शायद इसका सबसे उपयुक्त रूप यही हो सकता है—

“करो—क्योंकि देश को तुम्हारी जरूरत है।”

क्योंकि स्वतंत्रता केवल विरासत में मिली कोई उपलब्धि नहीं है।

उसे हर पीढ़ी को अपने चरित्र, अपने कर्म और अपनी जिम्मेदारी से सार्थक करना पड़ता है।

यही भारत छोड़ो आंदोलन की आज की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।