अयोध्या के प्रसिद्ध राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि मुंबई का ऐतिहासिक और दुनिया भर में मशहूर सिद्धिविनायक मंदिर भी एक बड़े वित्तीय विवाद की चपेट में आ गया है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह मुद्दा उस समय अचानक गरमा गया जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि सिद्धिविनायक मंदिर की दानपेटी से हर साल लगभग 18 करोड़ रुपये की चोरी और गबन किया जा रहा है।

इस गंभीर दावे के बाद मंदिर के प्रशासन और राज्य सरकार के भीतर खलबली मच गई है, जिसके चलते महाराष्ट्र के कानून और न्याय विभाग को इस पूरे मामले में दखल देना पड़ा है और वित्तीय जांच के आदेश जारी करने पड़े हैं।

राज ठाकरे ने इस पूरे विवाद को 1 अगस्त को एमएनएस के छात्र संगठन के 20वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में हवा दी। मंच से एक पत्र पढ़ते हुए उन्होंने दावा किया कि सिद्धिविनायक मंदिर के ट्रस्टियों ने खुद 21 अप्रैल 2026 को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को पत्र लिखकर इस गबन की जानकारी दी थी।

क्या है पत्र में

इस पत्र के अनुसार, मंदिर प्रशासन द्वारा उठाए गए सख्त सुधारात्मक कदमों के बाद दानपेटी से चोरी करने वाले कुछ कर्मचारियों को रंगे हाथों पकड़ा गया था। कर्मचारियों के पकड़े जाने से पहले हर बुधवार को दानपेटी में जमा होने वाला चढ़ावा 50 लाख रुपये से भी कम दर्ज किया जाता था, लेकिन जैसे ही इन संदिग्ध कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई।

अगले तीन हफ्तों के भीतर साप्ताहिक दान की राशि अचानक बढ़कर लगभग डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंच गई। पत्र में हिसाब लगाया गया था कि हर हफ्ते हो रही करीब एक करोड़ रुपये की इस चोरी से मंदिर को सालाना 18 करोड़ रुपये का सीधा आर्थिक नुकसान हो रहा था और इसमें मंदिर के उच्चाधिकारियों की संलिप्तता की आशंका जताई गई थी।

ट्रस्ट का बयान

गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सदा सर्वणकर और ट्रस्टी राहुल लोंढे ने प्रेस के सामने आकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। ट्रस्ट ने राज ठाकरे के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि उपमुख्यमंत्री को ऐसा कोई पत्र भेजा गया था, हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि दान संग्रह की आंतरिक व्यवस्था में कुछ प्रशासनिक खामियां जरूर मौजूद थीं।

ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि उन्होंने किसी बाहरी दबाव में आकर नहीं, बल्कि खुद मई 2026 में महाराष्ट्र सरकार के कानून और न्याय विभाग से मंदिर के वित्तीय खातों का व्यापक ऑडिट कराने का अनुरोध किया था। वर्तमान में चल रही विभागीय कार्रवाई और एंटी करप्शन ब्यूरो की समीक्षा इसी ऑडिट प्रक्रिया का हिस्सा है।

यह पूरा मामला केवल दानपेटी की नकदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें मंदिर में सुरक्षा और प्रबंधन से जुड़ी अन्य पुरानी शिकायतों से भी जुड़ी हैं। इससे पहले मंदिर के कुछ कर्मचारियों पर आरोप लगा था कि वे आम श्रद्धालुओं को दरकिनार कर वीवीआईपी कतार से दर्शन कराने के बदले अवैध रूप से पैसे वसूलते थे।

इसके अलावा, 20 मार्च को दानपेटी से नकदी गायब होने की आधिकारिक सूचना के बाद दादर पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया गया था। पुलिस जांच और सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से पता चला कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति लगातार 10 दिनों तक मंदिर की एक छोटी दानपेटी से पैसे निकालते रहे। पुलिस ने इस संबंध में 80,000 रुपये की बरामदगी करते हुए आठ लोगों को गिरफ्तार किया और कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की, जो फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

राजनीतिक बयानबाजी तेज

इस संवेदनशील मामले ने महाराष्ट्र के राजनैतिक गलियारों में तीखी जुबानी जंग को जन्म दे दिया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता राम कदम ने राज ठाकरे के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि उनके पास कोई ठोस सबूत हैं तो उन्हें पुलिस या सरकार को सौंपने चाहिए, क्योंकि बिना जांच के ऐसे दावे करने से देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस पहुंचती है।

वहीं सत्ताधारी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के प्रवक्ता संजय निरुपम ने पलटवार करते हुए याद दिलाया कि जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे, तब भी एमएनएस नेताओं ने ऐसे ही आरोप लगाए थे। दूसरी तरफ, विरोधी खेमे की शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी और एनसीपी (शरद चंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।

विपक्षी नेताओं ने सिद्धिविनायक मंदिर के साथ-साथ नासिक महाकुंभ और अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग तेज कर दी है।