क्या 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस में वापसी हो सकती है? फिलहाल इसके लिए सिर्फ अटकलें लगाई जा रही हैं। कोई पक्की खबर या किसी तरह से पुष्टि नहीं की जा सकती है। खुद अमरिंदर ने इस अटकल को खारिज करते हुए साफ कहा है कि वे कांग्रेस में वापस नहीं लौट रहे। लेकिन यह चर्चा तब और तेज हो गई जब राहुल गांधी ने हाल ही में पूर्व पंजाब मुख्यमंत्री का दोस्ताना अंदाज में जिक्र किया।
गुरुवार रात एक इंस्टाग्राम “आस्क मी एनीथिंग” सेशन में, जब राहुल गांधी से बीजेपी के उनके पसंदीदा नेता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अमरिंदर सिंह का नाम लिया। उन्होंने कहा, “मेरी उनसे अच्छी बनती है, वे कूल हैं। वे मिलिट्री हिस्ट्री के जानकार हैं,” और “हेलो, अंकल अमरिंदर” कहकर उन्हें याद किया।
अमरिंदर का जवाब
राहुल की इस टिप्पणी पर अमरिंदर सिंह ने शुक्रवार को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि गांधी परिवार के साथ उनका निजी रिश्ता हमेशा बना रहेगा, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता बीजेपी के साथ है।
पंजाब बीजेपी ने राहुल की इस तारीफ का स्वागत तो किया, लेकिन सवाल भी उठाया कि कांग्रेस नेताओं को अमरिंदर का योगदान उनके पार्टी छोड़ने के बाद ही क्यों याद आया।
टाइमिंग क्यों अहम है
यह चर्चा ऐसे समय हो रही है जब पंजाब कांग्रेस एक बार फिर आंतरिक मतभेदों से जूझ रही है। मुख्य टकराव पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच है। दोनों के अपने-अपने समर्थक और महत्वाकांक्षाएं हैं, जबकि कई अन्य वरिष्ठ नेता भी अपनी राजनीतिक जगह बचाने की कोशिश में जुटे हैं।
हाल ही में कांग्रेस के कई नेता राणा गुरजीत सिंह के आवास पर इकट्ठा हुए और राज्य इकाई के कामकाज पर चिंता जताई। राणा गुरजीत सिंह पहले अमरिंदर सिंह के करीबी रहे हैं, जिससे कांग्रेस के कुछ हिस्सों में कैप्टन के प्रभाव को लेकर अटकलें और बढ़ गई हैं।
राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए राणा गुरजीत सिंह ने कहा कि दोनों परिवारों के बीच पुराना पारिवारिक रिश्ता रहा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे चाहते हैं कि अमरिंदर कांग्रेस में लौटें, तो उन्होंने कहा, “मैं कुछ नहीं चाहता।” हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि अमरिंदर को कांग्रेस नहीं छोड़नी चाहिए थी। उनके मुताबिक, “अगर वे रुके होते, तो वे एक पिता समान नेता होते, जिनसे हर मुद्दे पर सलाह ली जाती।”
फिलहाल, अमरिंदर की वापसी अटकलें अभी भी जारी रहने की बात कही जा रही है।
अमरिंदर का राजनीतिक कद
अमरिंदर सिंह के पास काफी राजनीतिक अनुभव है। वे दो बार पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई थी। उनका दूसरा कार्यकाल 2021 में कांग्रेस आलाकमान के साथ कड़वी लीडरशिप लड़ाई के बाद खत्म हुआ। उन्होंने पार्टी छोड़ी और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए।
लेकिन पुराने कांग्रेस नेताओं के बीच उनका राजनीतिक नेटवर्क और प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि 2027 चुनाव की तैयारी में अमरिंदर का अनुभव और पंजाब के राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों की उनकी समझ काम आ सकती है। वे प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच एक पुल की भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन खतरा भी
कांग्रेस पहले भी आंतरिक कलह की कीमत चुका चुकी है। अमरिंदर-सिद्धू के टकराव और उसके बाद अमरिंदर के पार्टी छोड़ने से 2022 चुनाव से पहले पार्टी बुरी तरह बंट गई थी, और कांग्रेस वह चुनाव आम आदमी पार्टी से हार गई थी।
आज भी पार्टी में कई सत्ता केंद्र मौजूद हैं। चन्नी खेमा है, आलाकमान समर्थित वड़िंग खेमा है, और प्रताप सिंह बाजवा व सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे अन्य वरिष्ठ नेता भी हैं। अगर अमरिंदर लौटते हैं, तो वे एक और सत्ता केंद्र बन सकते हैं।
अगर वे गुटों को एकजुट करने में कामयाब होते हैं, तो इससे कांग्रेस मजबूत हो सकती है। लेकिन अगर इससे एक नई लीडरशिप की जंग शुरू होती है, तो पार्टी और कमजोर हो सकती है।
उनकी भूमिका क्या होगी ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अमरिंदर लौटते भी हैं, तो उनकी भूमिका क्या होगी। अगर कांग्रेस उन्हें एक वरिष्ठ मार्गदर्शक, चुनावी रणनीतिकार या सहमति बनाने वाले नेता के तौर पर वापस लाती है, तो उनका अनुभव पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन अगर वे सत्ता के एक और दावेदार के तौर पर लौटते हैं, तो पार्टी को फिर से आंतरिक कलह का सामना करना पड़ सकता है।
राहुल गांधी पहले ही पंजाब कांग्रेस नेताओं को चेतावनी दे चुके हैं कि कोई भी व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं है, और जो टीम के तौर पर काम नहीं करेंगे, उन्हें किनारे किया जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस को एक और लीडरशिप लड़ाई की नहीं, बल्कि एकजुटता की जरूरत है। पंजाब के मतदाता लगातार गुटबाजी से प्रभावित होने वाले नहीं हैं।
अगर अमरिंदर की वापसी कभी होती भी है, तो यह कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक बढ़त दे सकती है, लेकिन तभी जब वे चन्नी, वड़िंग और बाकी नेताओं के बीच पुल का काम करें। अगर वे खुद एक नया गुट बन जाते हैं, तो उनकी वापसी संकट को और गहरा कर सकती है।
फिलहाल कैप्टन का कहना है कि वे वापस नहीं आ रहे। लेकिन इस चर्चा का दोबारा उठना यह जरूर दिखाता है कि पंजाब की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




