भारतीय सेना में नेपाल के गोरखा सैनिकों की भर्ती को लेकर बना गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इस मुद्दे को लेकर तब और स्पष्टता आई जब भारतीय सेना के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत खुद नेपाल के साथ इस मामले को नहीं उठाएगा। उनका साफ कहना था कि यह मुद्दा अब नेपाल द्वारा अपनाई जाने वाली नीति पर निर्भर करता है।
नेपाल ने भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती प्रक्रिया पर असहमति जताते हुए अपने नागरिकों की भर्ती पर रोक लगा दी थी। यह असहमति तब सामने आई जब भारत सरकार ने लगभग पांच साल पहले भारतीय सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए ‘अग्निपथ योजना’ लागू की थी।
पूर्व CDS अनिल चौहान और भारतीय सेना का रुख
हाल ही में भारतीय सेना के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस मुद्दे पर भारत का रुख स्पष्ट किया था। उन्होंने कहा कि जब अग्निवीर योजना लागू की गई थी, तब नेपाली गोरखाओं को भी भारतीय नागरिकों के समान ही माना गया था।
पूर्व CDS चौहान का कहना था कि यह संभव नहीं है कि भारतीय सेना में नेपाली नागरिकों के साथ एक तरह की सेवा शर्तें रखी जाएं और भारतीय नागरिकों के साथ दूसरे तरह की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अग्निपथ योजना के तहत अपने नागरिकों को भर्ती होने की अनुमति देना या न देना पूरी तरह से नेपाल सरकार का निर्णय है।
भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता का भी कहना है कि इस मुद्दे पर भारत की ओर से किसी नई पहल की उम्मीद नहीं है। उन्होंने बताया कि जनरल चौहान ने 11वीं गोरखा रेजिमेंट में एक लंबा समय बिताया था। इसके अलावा, सीडीएस रहते हुए भी उनके यही विचार थे।
भारत इस मुद्दे को नेपाल के साथ नहीं उठाएगा क्योंकि तकनीकी और कानूनी रूप से भारत ने 1947 के समझौते का कोई उल्लंघन नहीं किया है। हालांकि, रणनीतिक स्तर पर भारत को नेपाल से पहले परामर्श कर लेना चाहिए था।
क्या है 1947 का त्रिपक्षीय समझौता और अग्निपथ का असर?
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने साल 1815 में पहली बार गोरखा सैनिकों की भर्ती शुरू की थी। इसके बाद साल 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ।
भारत की आजादी के समय छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना का हिस्सा बनीं, जबकि चार इकाइयां ब्रिटेन चली गईं।
त्रिपक्षीय समझौते के तहत यह शर्त रखी गई थी कि नेपाली सैनिकों को भी समान वेतन और समान शर्तें दी जाएंगी। भारत का तर्क है कि वह आज भी इस वादे को निभा रहा है।
अग्निपथ योजना के तहत केवल 25 प्रतिशत सैनिकों को चार साल की सेवा के बाद स्थायी किया जाता है, जबकि बाकी को सेवामुक्त कर दिया जाता है।
नेपाल की पिछली सरकारों का मानना था कि चार साल बाद सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की वापसी से देश में सुरक्षा चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
नेपाल सरकार का बयान और लामजुंग में पूर्व सैनिकों का प्रदर्शन
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा था कि नेपाल 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि यदि समझौते की समीक्षा के लिए भारत की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है, तो नेपाल उस पर चर्चा के लिए तैयार है।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत यात्रा या हालिया बातचीत के दौरान भारत ने यह मुद्दा औपचारिक रूप से नहीं उठाया है।
दूसरी ओर, नेपाल के लामजुंग जिले में पूर्व भारतीय गोरखा सैनिकों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। लामजुंग भारतीय पूर्व सैनिक विकास समिति के सलाहकार, सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर खेमजोंग गुरुंग ने कहा कि देश में रोजगार के अवसर नहीं हैं।
यदि अग्निवीर के तहत केवल 25 प्रतिशत युवाओं को भी स्थायी नौकरी मिलती है, तो यह युवाओं के लिए बड़ा सहारा होगा। पूर्व सैनिकों ने चेतावनी दी है। यदि सरकार ने जल्द ही इस मामले को हल करने के लिए राजनयिक पहल नहीं की, तो वे सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।

Jitendra Kumar is a graduate of the acclaimed IIMC with extensive experience across leading newspapers and media organisations.




